झूठी एफ़आईआर रद्द कैसे कराएँ, और फ़ैसले के खिलाफ़ अपील कब करें?
संपादक: डॉ. अखिल सिंह · अंतिम अद्यतन: 2 अक्टूबर 2026
आपके या परिवार के किसी सदस्य के खिलाफ़ दर्ज एफ़आईआर या आपराधिक मामला झूठा या बदले की भावना से किया गया लगता है, तो उसे रद्द कराने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर होती है (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528, या संविधान का अनुच्छेद 226)। निचली अदालत सज़ा सुना चुकी है, तो रास्ता अपील है — फ़ैसले की तारीख़ से उच्च न्यायालय में 60 दिन और सत्र न्यायालय में 30 दिन के भीतर।
अभी क्या करें
- एफ़आईआर की प्रति लें। एफ़आईआर नंबर, थाना, तारीख़ और लगी हुई धाराएँ एक काग़ज़ पर लिख लें। एफ़आईआर दर्ज कराने या उसकी प्रति न मिलने पर क्या करें, यह एफ़आईआर और पुलिस शिकायत वाले पृष्ठ पर है।
- पता करें कि मामला अभी किस चरण में है — सिर्फ़ एफ़आईआर हुई है, जाँच चल रही है, आरोप-पत्र (चार्जशीट) दाखिल हो चुका है, अदालत से समन आया है, या फ़ैसला आ चुका है। आगे का हर रास्ता और हर समय-सीमा इसी से तय होती है।
- फ़ैसला आ चुका है, तो उसी दिन या अगले दिन फ़ैसले की प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन करें। अपील की समय-सीमा चल रही है।
- अपने पक्ष के सबूत मूल रूप में सुरक्षित करें — मैसेज, ईमेल, कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी, बैंक लेनदेन, पहले की शिकायतें। फ़ोन न बदलें और कोई चैट डिलीट न करें।
- पुलिस का कोई नोटिस आया है, तो उसे अनदेखा न करें। नोटिस की फ़ोटो रखें और तय तारीख़ से पहले अधिवक्ता को दिखाएँ।
- गिरफ़्तारी की आशंका है, तो एफ़आईआर रद्द कराने के साथ जमानत के बारे में भी अभी सोचें। ये दोनों अलग रास्ते हैं और एक-दूसरे का इंतज़ार नहीं करते।
- सामने वाले पक्ष से समझौते की बात चल रही है, तो कोई भी लिखित काग़ज़ बिना पढ़े या अधिवक्ता को दिखाए बिना साइन न करें।
आपकी स्थिति कौन-सी है
| आपकी स्थिति | आपको क्या चाहिए |
|---|---|
| मेरे खिलाफ़ झूठी एफ़आईआर हुई है, अभी पुलिस जाँच चल रही है। | उच्च न्यायालय में एफ़आईआर रद्द कराने की याचिका पर विचार; गिरफ़्तारी का डर हो तो साथ में जमानत की तैयारी। |
| आरोप-पत्र दाखिल हो चुका है और अदालत से समन आया है। | उच्च न्यायालय में कार्यवाही रद्द कराने की याचिका, या निचली अदालत में आरोपमुक्ति (डिस्चार्ज) का आवेदन — इसकी 60 दिन की अवधि पर ध्यान दें। |
| हमारा आपस में समझौता हो गया है, अब केस खत्म करना है। | अपराध कानून में समझौता-योग्य हो तो निचली अदालत में समझौता; न हो तो उच्च न्यायालय में समझौते के आधार पर याचिका। पति-पत्नी के विवाद में यह अक्सर होता है — देखें घरेलू हिंसा और 498A मामले। |
| निचली अदालत ने मुझे या मेरे परिजन को सज़ा सुना दी है। | ऊपरी अदालत में सज़ा के खिलाफ़ अपील, और अपील चलने तक सज़ा स्थगित करने व जमानत का आवेदन। |
| आरोपी बरी हो गया है, मैं पीड़ित या शिकायतकर्ता हूँ। | बरी होने के खिलाफ़ अपील। निजी शिकायत वाले मामलों में पहले उच्च न्यायालय की विशेष अनुमति लेनी होती है। |
| मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय का कोई बीच का आदेश गलत लगता है, जैसे आरोप तय करना। | ऊपरी अदालत में पुनरीक्षण (रिविज़न) याचिका। |
क्या मेरी एफ़आईआर रद्द हो जाएगी?
सीधी बात: यह कोई पहले से नहीं बता सकता। जो व्यक्ति आपको एफ़आईआर रद्द होने की ‘गारंटी’ देता है, वह आपको धोखा दे रहा है। उच्च न्यायालय यह शक्ति सोच-समझकर इस्तेमाल करता है, और ज़्यादातर मामलों में जाँच और मुक़दमे को चलने देता है। अदालत आम तौर पर ये बातें देखती है:
- एफ़आईआर में लिखी बातें अगर पूरी तरह सच मान ली जाएँ, तब भी क्या कोई अपराध बनता है?
- आरोप कितने ठोस हैं — तारीख़, जगह और हर व्यक्ति की भूमिका लिखी है, या पूरे परिवार के नाम एक साथ डाल दिए गए हैं?
- क्या मामला असल में पैसे, संपत्ति या अनुबंध का विवाद है जिसे आपराधिक रंग दिया गया है?
- क्या बदले की भावना का स्पष्ट रिकॉर्ड है — पहले से चल रहा मुक़दमा, धमकी, या शिकायत की तारीख़ का संयोग?आपके हाथ में
- क्या आपके पास ऐसे दस्तावेज़ हैं जिन पर विवाद ही नहीं हो सकता, जैसे उस समय कहीं और होने का सरकारी रिकॉर्ड?आपके हाथ में
- अपराध कितना गंभीर है। हत्या, बलात्कार, डकैती जैसे गंभीर अपराधों में अदालतें आम तौर पर समझौते के आधार पर मामला खत्म नहीं करतीं; पारिवारिक या व्यापारिक निजी विवादों में समझौते पर विचार हो सकता है।
- याचिका कितनी पूरी तैयारी से दायर हुई। एक बार खारिज होने पर उन्हीं आधारों पर दूसरी याचिका आम तौर पर नहीं सुनी जाती।आपके हाथ में
जिन बातों के आगे “आपके हाथ में” लिखा है, उन पर आप आज से काम कर सकते हैं — रिकॉर्ड जुटाना और पहली याचिका पूरी तैयारी से दायर कराना।
अपील में भी यही बात लागू होती है। सज़ा के खिलाफ़ अपील में फ़ैसला बदलेगा या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि निचली अदालत के रिकॉर्ड में सबूत क्या हैं और सुनवाई में कोई कानूनी चूक हुई या नहीं। इसकी गारंटी भी कोई नहीं दे सकता।
कितना समय लगता है
इस काम में एक नहीं, कई अलग-अलग घड़ियाँ चलती हैं। कुछ की अवधि कानून में तय है, कुछ की नहीं:
- एफ़आईआर से याचिका तकएफ़आईआर रद्द कराने की याचिका के लिए कानून में कोई तय अवधि नहीं लिखी है, लेकिन देर करने से नुकसान होता है — अदालत पूछ सकती है कि इतने समय तक आप चुप क्यों रहे। जाँच अभी शुरुआती चरण में है, सिर्फ़ इस कारण से याचिका का रास्ता बंद नहीं होता; सर्वोच्च न्यायालय ने 2025 में यह बात दोहराई है।
- आरोप-पत्र के बाद आरोपमुक्ति (डिस्चार्ज) का आवेदननए कानून में इसके लिए 60 दिन लिखे गए हैं — सत्र न्यायालय के मामलों में मामला सौंपे (कमिट) जाने की तारीख़ से, और मजिस्ट्रेट के वारंट मामलों में दस्तावेज़ों की प्रतियाँ मिलने की तारीख़ से (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 250(1) और 262(1))।
- याचिका दायर होने से अंतिम आदेश तकइसका कोई तय समय नहीं है। यह उच्च न्यायालय की सूची पर निर्भर करता है।
- सज़ा के खिलाफ़ अपीलउच्च न्यायालय में 60 दिन, और किसी अन्य अदालत (जैसे सत्र न्यायालय) में 30 दिन — सज़ा या आदेश की तारीख़ से। मृत्युदंड के मामले में 30 दिन (परिसीमा अधिनियम, 1963 की अनुसूची, अनुच्छेद 115)। फ़ैसले की प्रमाणित प्रति लेने में लगे दिन इसमें नहीं गिने जाते (परिसीमा अधिनियम की धारा 12)। आख़िरी तारीख़ फ़ैसले वाले दिन ही अधिवक्ता से गिनवा लें।
- बरी होने के खिलाफ़राज्य की ओर से अपील के लिए 90 दिन (अनुच्छेद 114)। निजी शिकायत पर चले मामले में शिकायतकर्ता को बरी होने की तारीख़ से 60 दिन के भीतर उच्च न्यायालय से विशेष अनुमति माँगनी होती है; शिकायतकर्ता लोक सेवक (सरकारी कर्मचारी) हो तो छह महीने (धारा 419(5))। पीड़ित की अपील की आख़िरी तारीख़ अधिवक्ता से पक्की करें।
- बीच के आदेश के खिलाफ़ पुनरीक्षण (रिविज़न)आदेश की तारीख़ से 90 दिन (परिसीमा अधिनियम, 1963 की अनुसूची, अनुच्छेद 131)।
अधिवक्ता की ज़रूरत कब पड़ती है
- पुलिस ने नोटिस भेजा है, या गिरफ़्तारी की बात हो रही है।
- आरोप-पत्र दाखिल हो गया है, या अदालत से समन या वारंट आया है।
- फ़ैसला आ चुका है और अपील की अवधि चल रही है।
- सामने वाला पक्ष समझौते के लिए तैयार है और लिखित समझौता बनना है।
- आप पहले एक याचिका दायर कर चुके हैं और वह खारिज हो गई।
- एक ही घटना पर एक से ज़्यादा थानों, ज़िलों या राज्यों में एफ़आईआर दर्ज हैं।
- आपका मामला उत्तर प्रदेश का है: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 27 मई 2025 को यह प्रश्न नौ न्यायाधीशों की पीठ को भेजा था कि धारा 528 के तहत एफ़आईआर और जाँच रद्द की जा सकती है या नहीं। याचिका का रास्ता (धारा 528 या अनुच्छेद 226) चुनने से पहले इसकी वर्तमान स्थिति अधिवक्ता से जाँच लें।
इनमें से कोई स्थिति आप पर लागू होती है, तो अपनी बात व्हाट्सऐप पर लिखिए — किस थाने और ज़िले का मामला है, कौन-सी धाराएँ लगी हैं, और मामला किस चरण में है।
क्या तैयार रखें
- एफ़आईआर की प्रति
- आरोप-पत्र (चार्जशीट) की प्रति, यदि दाखिल हो चुका है
- पुलिस का नोटिस, अदालत का समन या वारंट
- फ़ैसले और आदेश की प्रमाणित प्रति (अपील के लिए)
- अपने पक्ष के सबूत — मैसेज, ईमेल, कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी, बैंक रिकॉर्ड
- पहले के विवाद, शिकायतों या मुक़दमों के काग़ज़
- समझौता हुआ है तो उसका मसौदा और दोनों पक्षों के पहचान पत्र
- आरोपी का पहचान और पते का प्रमाण
- पहले दायर कोई याचिका और उस पर आया आदेश
आम गलतियाँ
- “केस खत्म करा देंगे” या “ऊपर तक जान-पहचान है” कहने वाले बिचौलियों को पैसे देना। कोई भी व्यक्ति अदालत का फ़ैसला पहले से तय नहीं करा सकता।
- याचिका दायर करके यह मान लेना कि मुक़दमा रुक गया, और निचली अदालत की तारीख़ छोड़ देना।
- फ़ैसले की प्रति लेने में देर करना, और इसी में अपील की अवधि निकल जाना।
- आरोप-पत्र आने के बाद “बाद में देखेंगे” सोचकर आरोपमुक्ति के आवेदन की अवधि निकल जाने देना।
- शिकायतकर्ता या गवाहों पर दबाव डालकर समझौता कराना। इससे नया मामला बन सकता है।
- अपने पक्ष के मैसेज या रिकॉर्डिंग में काट-छाँट करना। बदला हुआ सबूत उल्टा पड़ता है।

सामान्य प्रश्न
क्या झूठी एफ़आईआर थाने से ही रद्द हो सकती है?
नहीं। पुलिस एफ़आईआर ‘रद्द’ नहीं करती। जाँच के बाद पुलिस अदालत को रिपोर्ट दे सकती है कि आरोप साबित नहीं हुए, और उस रिपोर्ट को स्वीकार या अस्वीकार करना अदालत का काम है। एफ़आईआर को सीधे रद्द करने की शक्ति उच्च न्यायालय के पास है।
एफ़आईआर रद्द कराने की याचिका कहाँ दायर होती है?
आम तौर पर उस राज्य के उच्च न्यायालय में, जिसके क्षेत्र में एफ़आईआर दर्ज हुई है। याचिका अधिवक्ता के माध्यम से दायर होती है।
क्या समझौता होने पर कोई भी केस खत्म हो सकता है?
हर केस नहीं। कुछ अपराध कानून में ही समझौता-योग्य हैं, और उनमें निचली अदालत में समझौता दर्ज हो सकता है। बाकी मामलों में उच्च न्यायालय निजी विवादों में समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द करने पर विचार कर सकता है, लेकिन गंभीर अपराधों में आम तौर पर नहीं करता।
क्या याचिका दायर होते ही गिरफ़्तारी रुक जाती है?
नहीं, अपने-आप नहीं। जब तक उच्च न्यायालय कोई अंतरिम आदेश न दे, पुलिस कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकती है। याचिका में अंतरिम राहत माँगी जा सकती है, पर वह हर मामले में नहीं मिलती। गिरफ़्तारी की आशंका हो तो जमानत का रास्ता अलग से देखना पड़ता है।
आरोपमुक्ति (डिस्चार्ज) और एफ़आईआर रद्द कराने में क्या अंतर है?
आरोपमुक्ति का आवेदन निचली अदालत में, आरोप तय होने से पहले दिया जाता है — जब अदालत देखती है कि मुक़दमा चलाने लायक सामग्री है या नहीं। नए कानून में इसके लिए 60 दिन की अवधि लिखी है (धारा 250 और 262)। एफ़आईआर या कार्यवाही रद्द कराने की याचिका उच्च न्यायालय में दायर होती है।
सज़ा के खिलाफ़ अपील कहाँ और कितने दिन में होती है?
मजिस्ट्रेट की सज़ा के खिलाफ़ अपील आम तौर पर सत्र न्यायालय में, और सत्र न्यायालय की सज़ा के खिलाफ़ उच्च न्यायालय में होती है (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 415)। अवधि सत्र न्यायालय के लिए 30 दिन और उच्च न्यायालय के लिए 60 दिन है, सज़ा की तारीख़ से (परिसीमा अधिनियम, अनुच्छेद 115)।
क्या अपील चलने तक जेल में रहना पड़ेगा?
ज़रूरी नहीं। अपील सुनने वाली अदालत सज़ा का अमल रोककर जमानत दे सकती है (धारा 430(1))। अगर व्यक्ति पहले से जमानत पर था और सज़ा तीन साल तक की है, या अपराध जमानती है, तो सज़ा सुनाने वाली अदालत अपील दायर करने के समय तक जमानत देती है, जब तक इनकार का कोई विशेष कारण न हो (धारा 430(3))।
आरोपी बरी हो गया, क्या पीड़ित अपील कर सकता है?
हाँ, कानून पीड़ित को बरी होने के खिलाफ़ अपील का अधिकार देता है (धारा 413 का परंतुक)। अगर मामला निजी शिकायत पर चला था, तो शिकायतकर्ता को बरी होने के 60 दिन के भीतर उच्च न्यायालय से विशेष अनुमति माँगनी होती है; लोक सेवक के लिए यह अवधि छह महीने है (धारा 419)।
क्या आप मेरे ज़िले या राज्य में सहायता करते हैं?
हाँ। Online Legal Help भारत के सभी ज़िलों के मामलों में सहायता करता है। अपना ज़िला, थाना और मामले का चरण व्हाट्सऐप पर लिखिए; आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।
Online Legal Help एक विधिक सूचना और सहायता मंच है। यह लॉ फर्म नहीं है और न ही विधिक सलाह देता है। आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।
कानूनी आधार और स्रोत
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 528: उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों की रक्षा। indiacode.nic.in
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय की रिट जारी करने की शक्ति।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 250(1) (सत्र मामलों में आरोपमुक्ति का आवेदन, कमिट होने से 60 दिन) और धारा 262(1) (मजिस्ट्रेट के वारंट मामलों में, दस्तावेज़ मिलने से 60 दिन)।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 413 (अपील केवल कानून में दिए अनुसार; परंतुक: पीड़ित का अपील का अधिकार), धारा 415 (दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील), धारा 419 (दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील; उप-धारा (5): विशेष अनुमति के लिए 60 दिन / लोक सेवक के लिए छह महीने), धारा 430 (अपील लंबित रहने तक सज़ा का निलंबन और जमानत)।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 438 (पुनरीक्षण के लिए अभिलेख मँगाना); धारा 359 (अपराधों का शमन/समझौता)।
- परिसीमा अधिनियम, 1963 — अनुसूची, अनुच्छेद 114 (दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील), अनुच्छेद 115 (दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील), अनुच्छेद 131 (पुनरीक्षण); धारा 5 (देरी की माफ़ी), धारा 12 (प्रमाणित प्रति में लगा समय नहीं गिना जाता)।
- State of Haryana v. Bhajan Lal, 1992 Supp (1) SCC 335 — किन परिस्थितियों में एफ़आईआर/कार्यवाही रद्द की जा सकती है।
- Gian Singh v. State of Punjab, (2012) 10 SCC 303; Narinder Singh v. State of Punjab, (2014) 6 SCC 466; Parbatbhai Aahir v. State of Gujarat, (2017) 9 SCC 641 — समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द करना।
- Neeharika Infrastructure Pvt. Ltd. v. State of Maharashtra (सर्वोच्च न्यायालय, 2021) — याचिका लंबित रहने के दौरान अंतरिम राहत।
- Imran Pratapgadhi v. State of Gujarat (सर्वोच्च न्यायालय, 28 मार्च 2025) — जाँच शुरुआती चरण में होना एफ़आईआर रद्द करने में पूर्ण बाधा नहीं।
- Shashank Gupta alias Guddu v. State of U.P., Application u/s 528 BNSS No. 10997 of 2025 (इलाहाबाद उच्च न्यायालय, 27 मई 2025) — एफ़आईआर और जाँच रद्द करने के प्रश्न पर नौ न्यायाधीशों की पीठ को संदर्भ।