सीधा उत्तर

बच्चा किसके पास रहेगा, यह कोई एक तय नियम नहीं बताता — अदालत देखती है कि बच्चे की भलाई किसमें है। कस्टडी के लिए ज़िले के परिवार न्यायालय में आवेदन दिया जा सकता है (संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890), या तलाक का केस चल रहा हो तो उसी में। केस के दौरान अंतरिम कस्टडी और मुलाक़ात भी माँगी जा सकती है। जिसके पास बच्चा नहीं रहता, उस माता-पिता को आम तौर पर मिलने और बात करने का अधिकार मिलता है।

अभी क्या करें

  1. बच्चा अभी कहाँ और किसके पास है, यह लिखकर रखें — पता, स्कूल, और किस तारीख़ से। कस्टडी का केस आम तौर पर उस ज़िले में होता है जहाँ बच्चा सामान्य रूप से रहता है, इसलिए यह जानकारी सबसे पहले काम आती है।
  2. अगर बच्चे की सुरक्षा को तुरंत ख़तरा है — मारपीट, नशे में देखभाल, या उसे छिपाकर कहीं ले जाया जा रहा है — तो देर न करें। 112 पर पुलिस को सूचना दें और उसी दिन अधिवक्ता से बात करें।
  3. बच्चे को ज़बरदस्ती वापस लाने की कोशिश न करें — स्कूल से उठाना, किसी के घर में घुसना या झगड़ा करना। कस्टडी का फ़ैसला अदालत करती है, और ऐसा कदम आपके ही खिलाफ़ जा सकता है।
  4. बच्चे से जुड़े काग़ज़ एक जगह जुटाएँ — जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल के काग़ज़, टीकाकरण और इलाज के रिकॉर्ड, फ़ोटो। ये दिखाते हैं कि अब तक बच्चे की रोज़ की देखभाल कौन करता आया है।
  5. बच्चे से मिलने या फ़ोन पर बात करने से मना किया जा रहा है, तो हर बार की तारीख़ और मैसेज संभालकर रखें। गुस्से में जवाब न लिखें — ये मैसेज अदालत में पढ़े जा सकते हैं।
  6. अगर तलाक, भरण-पोषण या घरेलू हिंसा का कोई केस पहले से चल रहा है, तो उसके काग़ज़ साथ रखें। कस्टडी और मुलाक़ात की माँग अक्सर उसी केस में भी की जा सकती है।
  7. अगर डर है कि बच्चे को दूसरे राज्य या देश से बाहर ले जाया जा सकता है, तो यह बात तुरंत अधिवक्ता को बताएँ। ऐसे मामलों में अदालत से जल्दी आदेश माँगने की ज़रूरत पड़ सकती है।

आपकी स्थिति कौन-सी है

आपकी स्थितिआपको क्या चाहिए
पति या पत्नी बच्चे को लेकर चले गए हैं और मुझे मिलने नहीं दे रहे।परिवार न्यायालय में कस्टडी का आवेदन, साथ में अंतरिम कस्टडी या मुलाक़ात की माँग।
तलाक का केस चल रहा है, बच्चा किसके पास रहेगा यह तय होना है।उसी केस में बच्चों की कस्टडी, पढ़ाई और खर्च के लिए अंतरिम और अंतिम आदेश की माँग (हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 26)। देखें तलाक — आपसी सहमति और विवादित।
बच्चा दूसरे माता-पिता के पास ठीक है, मैं बस उससे मिलना और बात करना चाहता/चाहती हूँ।मुलाक़ात का अधिकार (विज़िटेशन) — तय दिनों पर मिलना, छुट्टियों में साथ रहना, फ़ोन या वीडियो कॉल।
मुलाक़ात या कस्टडी का आदेश हो चुका है, पर दूसरा पक्ष पालन नहीं कर रहा।उसी अदालत में आदेश के पालन के लिए आवेदन। आदेश न मानने पर अदालत कार्रवाई कर सकती है।
बच्चे को किसी ने छिपाकर रखा है, पता नहीं वह कहाँ है।पुलिस को सूचना, और उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका — जब बच्चा ऐसे व्यक्ति के पास हो जिसे उसे रखने का कानूनी हक़ नहीं।
माता या पिता की मृत्यु हो गई है; दादा-दादी या नाना-नानी बच्चे को रखना चाहते हैं।संरक्षक नियुक्ति या कस्टडी का आवेदन। देखें संरक्षकता और गोद लेना।
हालात बदल गए हैं — दूसरे शहर में नौकरी, दूसरी शादी, या बच्चा बड़ा हो गया।पुराने कस्टडी या मुलाक़ात आदेश में बदलाव का आवेदन। ये आदेश बच्चे की भलाई के हिसाब से बदले जा सकते हैं।

क्या बच्चा मेरे पास रहेगा?

सीधी बात: कोई भी पहले से नहीं बता सकता कि कस्टडी किसे मिलेगी। जो व्यक्ति ‘बच्चा पक्का दिलवा देंगे’ की गारंटी देता है, वह आपको धोखा दे रहा है। अदालत के लिए सबसे ऊपर बच्चे की भलाई है — माता या पिता का हक़ उसके बाद आता है। अदालत आम तौर पर ये बातें देखती है:

  1. अब तक बच्चे की रोज़ की देखभाल कौन करता आया है — खाना, स्कूल, इलाज, सोना-जागना।
  2. बच्चे की उम्र। हिंदू कानून में पाँच साल से छोटे बच्चे की कस्टडी आम तौर पर माँ के पास रहती है, जब तक अदालत बच्चे की भलाई के लिए कुछ और ठीक न समझे।
  3. बच्चे की स्थिरता — उसका स्कूल, घर और आस-पास के लोग। अदालतें बच्चे को बार-बार एक घर से दूसरे घर भेजने को आम तौर पर अच्छा नहीं मानतीं।
  4. हर माता-पिता के पास बच्चे के लिए कितना समय, रहने की जगह और साधन हैं। पैसा देखा जाता है, पर अकेले पैसे से फ़ैसला नहीं होता।आपके हाथ में
  5. बच्चा समझदारी से अपनी पसंद बता सके, तो उसकी इच्छा — पर अदालत यह भी देखती है कि उसे सिखाया-पढ़ाया तो नहीं गया।
  6. दोनों माता-पिता का व्यवहार — कौन बच्चे को दूसरे से मिलने देता है, और कौन उसे दूसरे के खिलाफ़ भड़काता है।आपके हाथ में
  7. मारपीट, नशे या लापरवाही का कोई सबूत, और अदालत के पुराने आदेशों का पालन हुआ या नहीं।आपके हाथ में

जिन बातों के आगे “आपके हाथ में” लिखा है, उन पर आज से काम हो सकता है — बच्चे के लिए समय और जगह की तैयारी, अदालत के हर आदेश का पालन, और बच्चे के सामने दूसरे माता-पिता के बारे में बुरा न बोलना।

दूसरे पक्ष पर भी यही बात लागू होती है: जिसके पास अभी बच्चा है, उसकी कस्टडी अपने-आप पक्की नहीं हो जाती, और जिसके पास नहीं है, उसका मिलने का हक़ अपने-आप खत्म नहीं होता। माँ हों या पिता, अदालत दोनों से उम्मीद करती है कि बच्चा दोनों से जुड़ा रहे।

कितना समय लगता है

कस्टडी के मामले में एक नहीं, कई अलग-अलग घड़ियाँ चलती हैं:

  • अंतरिम कस्टडी और मुलाक़ातकेस चलते समय अदालत अंतरिम आदेश दे सकती है — बच्चा अभी किसके पास रहेगा और दूसरा माता-पिता कब मिलेगा। इसके लिए कानून में कोई तय समय नहीं लिखा। ज़रूरत गंभीर हो तो अधिवक्ता जल्दी सुनवाई माँग सकते हैं।
  • सुलह और काउंसलिंगपरिवार न्यायालय अक्सर पहले सुलह, मध्यस्थता या काउंसलर से बातचीत कराता है, और ज़रूरत हो तो बच्चे से भी बात करता है। इसमें कितना समय लगेगा, यह हर अदालत में अलग है।
  • अंतिम आदेशइसका कोई तय समय नहीं है। यह अदालत की सूची, दूसरे पक्ष के हाज़िर होने और सबूतों पर निर्भर करता है। अपने मामले का अंदाज़ा अधिवक्ता से लें।
  • आदेश के बादकस्टडी का आदेश हमेशा के लिए पत्थर की लकीर नहीं होता। हालात बदलें तो उसमें बदलाव का आवेदन दिया जा सकता है।
वह बात जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते: बच्चा जितने ज़्यादा समय तक एक ही माता-पिता के पास, दूसरे से मिले बिना रहता है, उतना ही वह उस घर का आदी होता जाता है — और अदालतें बच्चे की स्थिरता को महत्त्व देती हैं। इसलिए ‘कुछ महीने देख लेते हैं’ सोचकर बैठे न रहें। मुलाक़ात और अंतरिम आदेश समय पर माँगना अक्सर मायने रखता है।

अधिवक्ता की ज़रूरत कब पड़ती है

  • दूसरा पक्ष बच्चे को लेकर दूसरे शहर, दूसरे राज्य या विदेश चला गया है, या जाने की तैयारी में है।
  • बच्चे से मिलने या फ़ोन पर बात करने से पूरी तरह रोका जा रहा है।
  • तलाक, भरण-पोषण या घरेलू हिंसा का केस पहले से चल रहा है, और तय करना है कि कस्टडी किस केस में और किस अदालत में माँगी जाए।
  • बच्चे के साथ मारपीट, नशे में देखभाल या लापरवाही का डर है।
  • मुलाक़ात या कस्टडी का आदेश हो चुका है, पर उसका पालन नहीं हो रहा।
  • माता या पिता की मृत्यु के बाद दादा-दादी, नाना-नानी या कोई और रिश्तेदार बच्चे को रखना चाहता है।
  • शादी किसी अलग कानून के तहत हुई है — जैसे विशेष विवाह अधिनियम, या मुस्लिम या ईसाई विवाह — और सही रास्ता चुनना है।

इनमें से कोई स्थिति आप पर लागू होती है, तो अपनी बात व्हाट्सऐप पर लिखिए — किस ज़िले का मामला है, बच्चा कितने साल का है और अभी किसके पास है, कोई केस पहले से चल रहा है या नहीं, और आप बच्चे से आख़िरी बार कब मिले।

क्या तैयार रखें

  • बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र
  • विवाह प्रमाणपत्र, या शादी की फ़ोटो और निमंत्रण पत्र
  • बच्चे के स्कूल के काग़ज़ — दाख़िला, फ़ीस की रसीदें, रिपोर्ट कार्ड
  • टीकाकरण और इलाज के रिकॉर्ड
  • बच्चे के साथ आपकी फ़ोटो और वीडियो, तारीख़ के साथ
  • मिलने से मना करने वाले मैसेज, ईमेल या कॉल की सूची
  • अपनी आय, नौकरी और रहने की जगह का विवरण
  • पहचान और पते का प्रमाण
  • पहले के किसी केस — तलाक, भरण-पोषण, घरेलू हिंसा — की अर्ज़ी और आदेश
  • बच्चे का पासपोर्ट हो, तो उसकी प्रति

आम गलतियाँ

  • ‘बच्चा पक्का दिलवा देंगे’ या ‘अंदर बात हो जाएगी’ कहने वाले बिचौलियों को पैसे देना। कस्टडी का फ़ैसला कोई भी पहले से तय नहीं करा सकता।
  • बच्चे को ज़बरदस्ती उठा लाना — स्कूल के गेट से या किसी रिश्तेदार के घर से। इससे नया केस बन सकता है और अदालत में आपकी छवि बिगड़ती है।
  • बच्चे के सामने दूसरे माता-पिता को बुरा-भला कहना, या बच्चे को सिखाना कि अदालत में क्या बोलना है। अदालतें इसे पहचानती हैं।
  • मुलाक़ात से मना होने पर महीनों चुप बैठे रहना।
  • खर्च न मिलने पर बच्चे से मिलने से रोकना, या मिलने न दिए जाने पर बच्चे का खर्च बंद कर देना। दोनों अलग-अलग बातें हैं, और दोनों ही अदालत में आपके खिलाफ़ जा सकती हैं।
  • केस चलते समय अदालत की अनुमति के बिना बच्चे को दूसरे शहर या विदेश ले जाना।
  • आवेदन या शपथपत्र में बढ़ा-चढ़ाकर या झूठे आरोप लिखना।
बच्चे की कस्टडी और मुलाक़ात का सार: पहले चार काम, कस्टडी या मुलाक़ात, अदालत किन बातों को देखती है, ज़रूरी दस्तावेज़ और आम गलतियाँ
एक नज़र में — पूरा लेख एक चित्र में

सामान्य प्रश्न

क्या छोटे बच्चे की कस्टडी हमेशा माँ को ही मिलती है?

हमेशा नहीं। हिंदू कानून कहता है कि पाँच साल से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी आम तौर पर माँ के पास रहेगी (हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6)। ‘आम तौर पर’ का मतलब है कि बच्चे की भलाई के लिए अदालत अलग फ़ैसला भी कर सकती है। दूसरे धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में छोटे बच्चों की देखभाल के अपने नियम हैं, पर हर मामले में अदालत बच्चे की भलाई को सबसे ऊपर रखती है।

क्या पिता को कस्टडी नहीं मिल सकती?

मिल सकती है। कानून में पिता को बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक माना गया है, और अदालतों ने कई मामलों में पिता को, और दादा-दादी या नाना-नानी को भी कस्टडी दी है। लेकिन फ़ैसला माँ या पिता होने से नहीं, बच्चे की भलाई से होता है (हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम की धारा 13)।

कस्टडी का केस कहाँ दायर होता है?

आम तौर पर उस ज़िले के परिवार न्यायालय में, जहाँ बच्चा सामान्य रूप से रहता है (संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 9; परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 7)। तलाक का केस चल रहा है, तो कस्टडी उसी केस में भी माँगी जा सकती है। बच्चे को हाल ही में किसी दूसरे शहर ले जाया गया है, तो सही ज़िला कौन-सा है, यह अधिवक्ता से तय कराएँ।

बच्चा किस उम्र में खुद चुन सकता है कि किसके पास रहेगा?

कोई तय उम्र नहीं है। कानून कहता है कि बच्चा समझदारी से अपनी पसंद बताने लायक हो, तो अदालत उसकी पसंद पर विचार कर सकती है (संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 17)। पर बच्चे की पसंद ही आख़िरी बात नहीं होती — अदालत यह भी देखती है कि उसे किसी ने सिखाया तो नहीं।

जिसके पास बच्चा नहीं है, क्या वह बच्चे से मिल सकता है?

आम तौर पर हाँ। सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी 2020 में कहा कि कस्टडी के मामलों में मुलाक़ात और बात करने का अधिकार साफ़ तय होना चाहिए। जिस माता-पिता के पास बच्चा नहीं है, उसे आम तौर पर रोज़ कुछ मिनट फ़ोन या वीडियो कॉल पर बात करने और छुट्टियों में मिलने का मौका मिलना चाहिए — जब तक कोई गंभीर कारण न हो।

बच्चे को दूसरा पक्ष ले गया है — क्या पुलिस बच्चा वापस दिला सकती है?

कस्टडी का फ़ैसला अदालत करती है, पुलिस नहीं। बच्चे की सुरक्षा को ख़तरा हो तो 112 पर तुरंत पुलिस को बताएँ। बच्चा ऐसे व्यक्ति के पास है जिसे कानूनी हक़ नहीं, तो उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी दी जा सकती है; सर्वोच्च न्यायालय ने 2019 में कहा कि यह माता-पिता के खिलाफ़ भी हो सकती है। कौन-सा रास्ता सही है, यह अधिवक्ता से तय कराएँ।

क्या बच्चा आधा समय माँ के पास और आधा पिता के पास रह सकता है?

अदालत ऐसा इंतज़ाम कर सकती है, पर यह बच्चे की उम्र और हालात पर निर्भर है। सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल 2025 में एक मामले में कहा कि छोटे बच्चों को हर कुछ हफ़्ते में एक घर से दूसरे घर भेजना उनकी भलाई के खिलाफ़ हो सकता है, और उसकी जगह तय दिनों पर मुलाक़ात का आदेश दिया।

क्या कस्टडी का आदेश बाद में बदल सकता है?

हाँ। कस्टडी और मुलाक़ात के आदेश बच्चे की भलाई के लिए होते हैं, इसलिए हालात बदलने पर — जैसे दूसरे शहर जाना, बच्चे की पढ़ाई की ज़रूरत, या किसी की लापरवाही — बदलाव का आवेदन दिया जा सकता है (हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 26)। बदलाव का ठोस कारण बताना होता है।

क्या दादा-दादी या नाना-नानी कस्टडी माँग सकते हैं?

हाँ, माँग सकते हैं, खासकर जब माता या पिता की मृत्यु हो गई हो या बच्चा लंबे समय से उनके पास रहा हो। अगस्त 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चे से खुद बात करने के बाद एक बच्चे की कस्टडी नाना-नानी को दी और पिता को सीमित मुलाक़ात का अधिकार दिया। हर मामला अपने तथ्यों पर तय होता है।

क्या आप मेरे ज़िले या राज्य में सहायता करते हैं?

हाँ। Online Legal Help भारत के सभी ज़िलों के मामलों में सहायता करता है। अपना ज़िला, बच्चे की उम्र, वह अभी किसके पास है, और मामला किस स्थिति में है, व्हाट्सऐप पर लिखिए; आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।

Online Legal Help एक विधिक सूचना और सहायता मंच है। यह लॉ फर्म नहीं है और न ही विधिक सलाह देता है। आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।

कानूनी आधार और स्रोत
  • संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act) — धारा 7 (बच्चे की भलाई के लिए संरक्षक नियुक्ति), धारा 9 (आवेदन उस ज़िला न्यायालय में जहाँ बच्चा सामान्य रूप से रहता है), धारा 12 (बच्चे को पेश करने और अंतरिम संरक्षण के आदेश), धारा 17 (बच्चे की भलाई; समझदार बच्चे की पसंद), धारा 25 (बच्चे को संरक्षक के पास लौटाने का आदेश), धारा 26 (अदालत की अनुमति के बिना क्षेत्र से बाहर न ले जाना)। indiacode.nic.in
  • हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 (Hindu Minority and Guardianship Act) — धारा 6 (प्राकृतिक संरक्षक; पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे की कस्टडी आम तौर पर माँ के पास), धारा 13 (बच्चे की भलाई सर्वोपरि)।
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 — धारा 26 (बच्चों की कस्टडी, भरण-पोषण और शिक्षा के अंतरिम और अंतिम आदेश; बाद में बदलाव)।
  • परिवार न्यायालय अधिनियम, 1984 — धारा 7, स्पष्टीकरण (छ) (बच्चे की संरक्षकता, कस्टडी और मुलाक़ात के मामले परिवार न्यायालय में)।
  • Tejaswini Gaud v. Shekhar Jagdish Prasad Tewari (सर्वोच्च न्यायालय, 7 मई 2019) — बच्चे को ऐसा व्यक्ति रखे जिसे कानूनी कस्टडी का हक़ नहीं, तो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका हो सकती है, माता-पिता के खिलाफ़ भी।
  • Yashita Sahu v. State of Rajasthan (सर्वोच्च न्यायालय, 20 जनवरी 2020) — मुलाक़ात और संपर्क का अधिकार; रोज़ फ़ोन या वीडियो कॉल; छुट्टियों में मुलाक़ात।
  • Vivek Singh v. Romani Singh, (2017) 3 SCC 231 (सर्वोच्च न्यायालय, 13 फ़रवरी 2017) — बच्चे की पसंद और उस पर प्रभाव; बच्चे को दूसरे माता-पिता के खिलाफ़ करना।
  • Arathy Ramachandran v. Bijay Raj Menon, 2025 INSC 587 (सर्वोच्च न्यायालय, 30 अप्रैल 2025) — छोटे बच्चों की कस्टडी को समय-समय पर बाँटना उनकी भलाई के प्रतिकूल; तय दिनों पर मुलाक़ात।
  • Mohtashem Billah Malik v. Sana Aftab (सर्वोच्च न्यायालय, 4 फ़रवरी 2026) — बच्चे की भलाई सर्वोपरि है पर अकेला आधार नहीं; माता-पिता की आर्थिक स्थिति, जीवन-स्तर, पढ़ाई और आचरण भी देखे जाते हैं।
  • A v. B, 2026 INSC 818 (सर्वोच्च न्यायालय, 11 अगस्त 2026) — बच्चे से बातचीत के बाद कस्टडी नाना-नानी को; पिता को सीमित मुलाक़ात।
  • आपात स्थिति में पुलिस: 112 (राष्ट्रीय आपातकालीन नंबर)।