सीधा उत्तर

अगर पति आपका और बच्चों का खर्च नहीं दे रहा, तो आप ज़िले के परिवार न्यायालय या मजिस्ट्रेट के सामने भरण-पोषण का आवेदन दे सकती हैं (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144)। केस चलते समय अंतरिम खर्च भी माँगा जा सकता है। तलाक का मुक़दमा चल रहा हो तो उसी में खर्च माँगा जाता है, और तलाक के समय या बाद स्थायी गुज़ारा भत्ता तय होता है। रक़म दोनों पक्षों की आय, ज़रूरतों और शादी के दौरान के जीवन-स्तर पर निर्भर करती है।

अभी क्या करें

  1. आवेदन देने में देर न करें। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार भरण-पोषण आम तौर पर आवेदन की तारीख़ से दिया जाता है, आदेश की तारीख़ से नहीं। जितनी देर करेंगी, उतने महीनों का पैसा हाथ से जा सकता है।
  2. पति की आय के जो भी सबूत मिल सकें, जुटाएँ — सैलरी स्लिप, नौकरी या दुकान का पता, आयकर रिटर्न, ज़मीन, किराया, गाड़ी। अदालत दोनों पक्षों से आय, संपत्ति और देनदारियों का शपथपत्र लेती है, इसलिए आपके पास जितनी जानकारी होगी, उतना अच्छा।
  3. अपने और बच्चों के महीने के असली खर्च लिखें — स्कूल फ़ीस, दवा, किराया, राशन, आना-जाना — और जितनी रसीदें हों, संभालकर रखें।
  4. शादी और बच्चों के काग़ज़ एक जगह रखें — विवाह प्रमाणपत्र या शादी की फ़ोटो और निमंत्रण पत्र, बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र।
  5. अगर पहले से कोई केस चल रहा है — तलाक, घरेलू हिंसा या 498A — तो उसके सारे आदेश साथ रखें। अलग-अलग केस में तय रक़म आपस में समायोजित होती है, इसलिए हर केस बताना ज़रूरी है।
  6. पति ने पहले कुछ पैसा दिया और अब बंद कर दिया है, तो हर महीने की तारीख़ और रक़म लिखकर रखें। पति से हुए मैसेज डिलीट न करें।
  7. अगर आप पति हैं और आपके खिलाफ़ आवेदन आया है, तो नोटिस की तारीख़ न छोड़ें और अपनी आय व खर्च के सही काग़ज़ तैयार रखें। आय छिपाना आम तौर पर उल्टा पड़ता है।

आपकी स्थिति कौन-सी है

आपकी स्थितिआपको क्या चाहिए
पति ने घर से निकाल दिया है, कोई खर्च नहीं दे रहा।परिवार न्यायालय या मजिस्ट्रेट के सामने भरण-पोषण का आवेदन, साथ में अंतरिम खर्च की माँग। मारपीट या प्रताड़ना भी हुई है तो घरेलू हिंसा कानून में आर्थिक राहत भी माँगी जा सकती है।
तलाक का केस चल रहा है, इस बीच खर्च चाहिए।उसी मुक़दमे में मुक़दमे के दौरान भरण-पोषण और मुक़दमे के खर्च का आवेदन (हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24)। देखें तलाक — आपसी सहमति और विवादित।
तलाक हो रहा है या हो चुका है, आगे के लिए रक़म तय करनी है।स्थायी गुज़ारा भत्ता — मासिक या एकमुश्त — तलाक के समय या बाद (हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25)। आपसी सहमति के तलाक में यह समझौते में लिखा जाता है।
भरण-पोषण का आदेश हो चुका है, पर पति पैसे नहीं दे रहा।उसी अदालत में बकाया वसूली का आवेदन — हर बकाया रक़म के लिए एक साल के भीतर।
हालात बदल गए हैं — आय बढ़ी या घटी, नौकरी गई, बच्चे बड़े हो गए।रक़म बदलवाने का आवेदन (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 146)।
पत्नी ने मेरे खिलाफ़ भरण-पोषण का केस किया है।समय पर जवाब और अपनी आय-संपत्ति का सही शपथपत्र। कानून में दिए आधार आप पर लागू होते हैं या नहीं, यह अधिवक्ता से जाँच कराएँ।
बेटा बूढ़े माता-पिता का खर्च नहीं उठा रहा।माता-पिता भी धारा 144 के तहत अपने लिए भरण-पोषण माँग सकते हैं, अगर वे अपना खर्च नहीं उठा सकते।

क्या मुझे गुज़ारा भत्ता मिलेगा, और कितना?

सीधी बात: यह कोई पहले से नहीं बता सकता कि रक़म मिलेगी या कितनी तय होगी। जो व्यक्ति आपको ‘पक्की रक़म’ या ‘आधी तनख़्वाह दिलाने’ की गारंटी देता है, वह आपको धोखा दे रहा है। कोई तय फ़ॉर्मूला नहीं है। अदालत आम तौर पर ये बातें देखती है:

  1. पति की असली आय और संपत्ति कितनी है — और वह कितनी साबित हो पाती है।आपके हाथ में
  2. आपकी अपनी आय या कमाने की क्षमता, और क्या आपने शादी या परिवार के लिए नौकरी छोड़ी थी।
  3. आपकी और बच्चों की ज़रूरतें — पढ़ाई, इलाज, रहने का खर्च — और शादी के दौरान का जीवन-स्तर।आपके हाथ में
  4. पति की दूसरी ज़िम्मेदारियाँ — आश्रित माता-पिता, कर्ज़, दूसरा परिवार।
  5. क्या पत्नी बिना उचित कारण साथ रहने से इनकार कर रही है, या दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हैं। इन हालात में धारा 144 के तहत पत्नी को भरण-पोषण नहीं मिलता।
  6. क्या किसी दूसरे केस में पहले से रक़म तय हो चुकी है — वह इस केस में ध्यान में रखी जाती है।
  7. आवेदन कितना पूरा है, और दोनों पक्षों का शपथपत्र कितना सच्चा और सबूत के साथ है।आपके हाथ में

जिन बातों के आगे “आपके हाथ में” लिखा है, उन पर आज से काम शुरू हो सकता है — आय के सबूत, खर्च की रसीदें, और समय पर आवेदन।

पति के लिए भी यही बात लागू होती है: रक़म कम होगी या ज़्यादा, यह कोई पहले से तय नहीं करा सकता। आय छिपाने या संपत्ति दूसरों के नाम करने से अक्सर नुकसान ही होता है, क्योंकि अदालत काग़ज़ों के साथ जीवन-स्तर भी देखती है।

कितना समय लगता है

भरण-पोषण के मामले में एक नहीं, कई अलग-अलग घड़ियाँ चलती हैं:

  • आवेदन की तारीख़रक़म आम तौर पर आवेदन की तारीख़ से दी जाती है, आदेश की तारीख़ से नहीं। इसलिए आवेदन में देर का नुकसान सीधे आपको होता है।
  • अंतरिम खर्चकानून कहता है कि अंतरिम खर्च का आवेदन, जहाँ तक संभव हो, नोटिस तामील होने के 60 दिनों के भीतर निपटाया जाए (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144; हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24)। व्यवहार में अक्सर इससे ज़्यादा समय लगता है।
  • अंतिम आदेश तकइसका कोई तय समय नहीं है। यह अदालत की सूची, पति कितनी जल्दी नोटिस पर हाज़िर होता है, और सबूतों पर निर्भर करता है। अपने मामले का अंदाज़ा अधिवक्ता से लें।
  • स्थायी गुज़ारा भत्तायह तलाक के मुक़दमे के साथ चलता है, इसलिए इसका समय उसी केस पर निर्भर करता है।
वह बात जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते: आदेश के बाद पति पैसे देना बंद कर दे, तो बकाया वसूली का आवेदन उस रक़म के बकाया होने की तारीख़ से एक साल के भीतर देना होता है। एक साल बीत जाने पर उस रक़म के लिए इस धारा में वारंट जारी नहीं होता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144(3))। महीनों तक इंतज़ार न करें।

अधिवक्ता की ज़रूरत कब पड़ती है

  • पति नोटिस के बाद भी अदालत नहीं आ रहा, या अपनी नौकरी और आय छिपा रहा है।
  • तलाक, घरेलू हिंसा या 498A का कोई केस पहले से चल रहा है, और तय करना है कि खर्च कहाँ और किस कानून में माँगा जाए।
  • पति दूसरे राज्य या विदेश में रहता है।
  • आदेश हो चुका है, पर पैसे नहीं आ रहे और बकाया बढ़ रहा है।
  • आपसी सहमति से तलाक में एकमुश्त रक़म तय हो रही है और समझौता लिखा जाना है।
  • आपके खिलाफ़, पति के रूप में, आवेदन आया है और जवाब व शपथपत्र दाखिल करना है।
  • शादी किसी अलग कानून के तहत हुई है — जैसे विशेष विवाह अधिनियम, या मुस्लिम या ईसाई विवाह — और सही रास्ता चुनना है।

इनमें से कोई स्थिति आप पर लागू होती है, तो अपनी बात व्हाट्सऐप पर लिखिए — किस ज़िले का मामला है, आप पत्नी हैं, पति हैं या माता-पिता, कोई केस पहले से चल रहा है या नहीं, और खर्च कब से नहीं मिल रहा।

क्या तैयार रखें

  • विवाह प्रमाणपत्र, या शादी की फ़ोटो और निमंत्रण पत्र
  • बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल के काग़ज़
  • अपनी आय का सबूत, या आय न होने का साफ़ विवरण
  • पति की आय के जो भी सबूत हों — सैलरी स्लिप, नौकरी का पता, आयकर रिटर्न, दुकान या ज़मीन की जानकारी
  • अपने बैंक खाते का स्टेटमेंट
  • महीने के खर्च की रसीदें — स्कूल फ़ीस, दवा, किराया
  • पति से हुई बातचीत के मैसेज — खर्च माँगने और मना करने के
  • पहले के किसी केस की अर्ज़ी और उसके आदेश
  • पहचान और पते का प्रमाण
  • पुराना भरण-पोषण आदेश हो, तो उसकी प्रति और किन महीनों में पैसे नहीं आए, उसकी सूची

आम गलतियाँ

  • ‘इतनी रक़म पक्की दिलवा देंगे’ या ‘अंदर बात हो जाएगी’ कहने वाले बिचौलियों को पैसे देना। कोई भी व्यक्ति अदालत की रक़म पहले से तय नहीं करा सकता।
  • आवेदन देने में महीनों की देर करना। रक़म आम तौर पर आवेदन की तारीख़ से मिलती है।
  • शपथपत्र में आय या संपत्ति छिपाना या गलत लिखना — चाहे आप पत्नी हों या पति। गलत शपथपत्र नई कानूनी मुसीबत बन सकता है।
  • एक केस में मिली रक़म या आदेश दूसरे केस में न बताना।
  • आदेश के बाद बकाया जमा होने देना और एक साल के भीतर वसूली का आवेदन न देना।
  • पति की ओर से: ऊपरी अदालत में चुनौती दायर करके यह मान लेना कि भुगतान रुक गया। जब तक रोक का आदेश न हो, आदेश लागू रहता है।
  • सोशल मीडिया पर एक-दूसरे के खिलाफ़ लिखना या बच्चों को झगड़े में बीच में लाना।
भरण-पोषण और गुज़ारा भत्ते का सार: पहले चार काम, कौन-सा रास्ता, रक़म किन बातों पर निर्भर है, ज़रूरी दस्तावेज़ और आम गलतियाँ
एक नज़र में — पूरा लेख एक चित्र में

सामान्य प्रश्न

क्या कमाने वाली पत्नी को भी भरण-पोषण मिल सकता है?

हो सकता है। सिर्फ़ इसलिए दावा खत्म नहीं होता कि पत्नी कुछ कमाती है या पढ़ी-लिखी है। अदालत देखती है कि उसकी आय उस जीवन-स्तर के लिए काफ़ी है या नहीं जो शादी के दौरान था, और पति की आय कितनी है। इससे रक़म घट-बढ़ सकती है।

भरण-पोषण का केस कहाँ दायर होता है?

उस ज़िले में जहाँ पति रहता है या मौजूद है, जहाँ पत्नी रहती है, या जहाँ दोनों आख़िरी बार साथ रहे थे (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 145)। यानी पत्नी अपने मायके वाले ज़िले में भी आवेदन दे सकती है। जिन ज़िलों में परिवार न्यायालय है, वहाँ यह आवेदन परिवार न्यायालय में जाता है।

क्या केस चलते समय ही कुछ पैसा मिल सकता है?

हाँ, इसे अंतरिम भरण-पोषण कहते हैं। केस चलने के दौरान अदालत मासिक खर्च और केस का खर्च दिलाने का आदेश दे सकती है। कानून कहता है कि यह आवेदन जहाँ तक संभव हो, नोटिस तामील होने के 60 दिनों में निपटाया जाए, पर व्यवहार में समय अलग-अलग लगता है।

भरण-पोषण और गुज़ारा भत्ता में क्या अंतर है?

बोलचाल में दोनों एक जैसे इस्तेमाल होते हैं। आम तौर पर ‘भरण-पोषण’ वह मासिक खर्च है जो शादी चलते हुए या केस के दौरान मिलता है। ‘स्थायी गुज़ारा भत्ता’ वह रक़म है जो तलाक के समय या बाद तय होती है — मासिक भी हो सकती है, एकमुश्त भी।

क्या तलाक के बाद भी भरण-पोषण मिल सकता है?

हाँ। धारा 144 में ‘पत्नी’ में वह तलाकशुदा महिला भी शामिल है जिसने दोबारा शादी नहीं की। सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई 2024 में स्पष्ट किया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी यह आवेदन दे सकती है। तलाक के समय स्थायी गुज़ारा भत्ता भी तय हो सकता है।

क्या पति भी पत्नी से खर्च माँग सकता है?

धारा 144 के तहत नहीं — वह पत्नी, बच्चों और माता-पिता के लिए है। लेकिन हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 और 25 में पति या पत्नी, जिसकी अपनी पर्याप्त आय न हो, दूसरे से खर्च माँग सकता है।

क्या एक साथ कई केस में भरण-पोषण माँगा जा सकता है?

अलग-अलग कानूनों में आवेदन दिए जा सकते हैं, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि एक केस में तय रक़म दूसरे केस में ध्यान में रखी जाएगी, और हर पिछले केस व आदेश की जानकारी देनी होगी। दोहरी रक़म अपने-आप नहीं मिलती।

पति आदेश के बाद भी पैसे न दे तो क्या होता है?

उसी अदालत में बकाया वसूली का आवेदन दिया जाता है। अदालत वसूली के लिए वारंट जारी कर सकती है, और भुगतान न होने पर हर महीने की बकाया रक़म के लिए एक महीने तक की जेल या भुगतान होने तक जेल का आदेश दे सकती है (धारा 144(3))। आवेदन एक साल के भीतर दें।

क्या तय रक़म बाद में बदली जा सकती है?

हाँ। अगर किसी पक्ष के हालात बदल जाएँ — आय बढ़े या घटे, नौकरी जाए, बच्चों का खर्च बढ़े — तो रक़म बदलवाने का आवेदन दिया जा सकता है (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 146)। बदलाव का सबूत देना होता है।

क्या आप मेरे ज़िले या राज्य में सहायता करते हैं?

हाँ। Online Legal Help भारत के सभी ज़िलों के मामलों में सहायता करता है। अपना ज़िला, आप किसकी ओर से लिख रहे हैं, और मामला किस स्थिति में है, व्हाट्सऐप पर लिखिए; आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।

Online Legal Help एक विधिक सूचना और सहायता मंच है। यह लॉ फर्म नहीं है और न ही विधिक सलाह देता है। आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।

कानूनी आधार और स्रोत
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 144: पत्नी, संतान और माता-पिता के भरण-पोषण का आदेश; अंतरिम भरण-पोषण और 60 दिनों में निपटारे का परंतुक; धारा 144(3) — वसूली, वारंट और एक वर्ष की सीमा; धारा 144(4) — पत्नी कब हकदार नहीं। indiacode.nic.in
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 145 (कार्यवाही कहाँ हो सकती है), धारा 146 (रक़म में परिवर्तन)।
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 — धारा 24 (मुक़दमे के दौरान भरण-पोषण और खर्च; 60 दिनों का परंतुक), धारा 25 (स्थायी गुज़ारा भत्ता)।
  • हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 — धारा 18 (पत्नी का भरण-पोषण), धारा 20 (संतान और वृद्ध माता-पिता)।
  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 — धारा 20 (आर्थिक राहत), धारा 23 (अंतरिम आदेश)।
  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954 — धारा 36 और 37 (मुक़दमे के दौरान और स्थायी भरण-पोषण)।
  • परिवार न्यायालय अधिनियम, 1984 — धारा 7 (परिवार न्यायालय का क्षेत्राधिकार)।
  • Rajnesh v. Neha, (2021) 2 SCC 324 (सर्वोच्च न्यायालय, नवंबर 2020) — संपत्ति और देनदारियों का शपथपत्र, अलग-अलग केस में रक़म का समायोजन, आवेदन की तारीख़ से भरण-पोषण, रक़म तय करने के आधार।
  • Aditi alias Mithi v. Jitesh Sharma, 2023 INSC 981 (सर्वोच्च न्यायालय, 8 नवंबर 2023) — Rajnesh v. Neha के निर्देशों का पालन अनिवार्य।
  • Mohd Abdul Samad v. State of Telangana (सर्वोच्च न्यायालय, 10 जुलाई 2024) — तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी धारा 125 दं.प्र.सं. (अब धारा 144 बीएनएसएस) के तहत आवेदन कर सकती है।
  • Rakhi Sadhukhan v. Raja Sadhukhan (सर्वोच्च न्यायालय, 29 मई 2025) — स्थायी गुज़ारा भत्ता शादी के दौरान के जीवन-स्तर के अनुरूप।
  • पुरानी धारा का मिलान: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125–128 अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144–147।