सीधा उत्तर

अगर पति या ससुराल वाले मारपीट, धमकी, दहेज की माँग या घर से निकालने जैसी हिंसा कर रहे हैं, तो आपके पास दो अलग रास्ते हैं: घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 में मजिस्ट्रेट से संरक्षण, घर में रहने और ख़र्च का आदेश, और पुलिस में भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 (पुरानी धारा 498A) में आपराधिक शिकायत। अगर आरोप आपके परिवार पर लगा है, तो पहला काम एफ़आईआर की प्रति लेना और गिरफ़्तारी से पहले जमानत का रास्ता देखना है।

अभी क्या करें

  1. तुरंत ख़तरा है तो 112 पर कॉल करें। महिला हेल्पलाइन 181 भी ज़्यादातर राज्यों में चौबीसों घंटे चलती है। पहले अपनी और बच्चों की सुरक्षा, बाकी सब बाद में।
  2. चोट लगी है तो सरकारी अस्पताल में इलाज कराएँ और मेडिकल पर्ची संभालकर रखें। चोट की फ़ोटो, धमकी वाले मैसेज और रिकॉर्डिंग की कॉपी किसी भरोसेमंद व्यक्ति या अपने ईमेल पर भी रखें, ताकि फ़ोन छिन जाए तब भी सबूत बचे।
  3. घर छोड़ना पड़े तो अपने ज़रूरी काग़ज़ साथ रखें — पहचान पत्र, शादी का प्रमाण, बैंक के काग़ज़, और गहनों व उपहारों (स्त्रीधन) की सूची या फ़ोटो।
  4. राहत चाहिए तो ज़िले के संरक्षण अधिकारी, महिला थाने या सीधे मजिस्ट्रेट के पास घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन दिया जा सकता है। ख़र्च और भरण-पोषण का सवाल भी इसी में उठ सकता है।
  5. आरोप आपके परिवार पर लगा है, तो एफ़आईआर की प्रति लें और लिख लें कि किन-किन लोगों के नाम हैं और कौन-सी धाराएँ लगी हैं। गिरफ़्तारी की आशंका हो तो अग्रिम जमानत के बारे में अभी सोचें।
  6. पुलिस का नोटिस या अदालत का समन आया है, तो उसे अनदेखा न करें। तय तारीख़ पर हाज़िर होना ज़रूरी है; नोटिस का पालन न करने पर गिरफ़्तारी का ख़तरा बढ़ता है।
  7. दोनों पक्ष एक-दूसरे को फ़ोन पर धमकाने, घर जाकर दबाव डालने या सोशल मीडिया पर लिखने से बचें। इससे नया मामला बनता है और आपका पक्ष कमज़ोर होता है।

आपकी स्थिति कौन-सी है

आपकी स्थितिआपको क्या चाहिए
पति या ससुराल वाले मारपीट करते हैं, गाली-गलौज करते हैं या घर से निकालने की धमकी देते हैं।घरेलू हिंसा अधिनियम में संरक्षण आदेश और घर में रहने का आदेश; हिंसा गंभीर हो तो पुलिस में शिकायत भी।
दहेज की माँग हो रही है और न देने पर मुझे परेशान किया जा रहा है।धारा 85 (पुरानी 498A) में एफ़आईआर, और ज़रूरत हो तो घरेलू हिंसा अधिनियम में राहत। गहने और सामान वापस चाहिए तो देखें स्त्रीधन की वापसी।
मुझे घर से निकाल दिया गया है और ख़र्च नहीं दिया जा रहा।घरेलू हिंसा अधिनियम में घर में रहने और ख़र्च के आदेश का आवेदन; साथ में भरण-पोषण का रास्ता।
मेरे और मेरे परिवार के खिलाफ़ 498A (अब धारा 85) की एफ़आईआर हो गई है।एफ़आईआर की प्रति, गिरफ़्तारी की आशंका हो तो अग्रिम जमानत, और पुलिस नोटिस का पालन।
बूढ़े माता-पिता, शादीशुदा बहन और दूर रहने वाले रिश्तेदारों के नाम भी एफ़आईआर में डाल दिए गए हैं।हर व्यक्ति पर लगे आरोप की जाँच; आरोप अस्पष्ट हों तो उच्च न्यायालय में एफ़आईआर रद्द कराने की याचिका पर विचार।
घरेलू हिंसा अधिनियम में अदालत से नोटिस आया है।तय तारीख़ पर उपस्थिति और लिखित जवाब। यह एफ़आईआर नहीं है, लेकिन अनदेखा करने पर अदालत आपकी गैरमौजूदगी में आदेश दे सकती है।
हम दोनों समझौता करना चाहते हैं और केस खत्म करना चाहते हैं।लिखित समझौता, ज़रूरत हो तो आपसी सहमति से तलाक, और 498A का केस खत्म कराने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका।

क्या मुझे राहत मिलेगी — और क्या गिरफ़्तारी होगी?

सीधी बात: इनमें से किसी सवाल का जवाब कोई पहले से नहीं दे सकता। जो व्यक्ति आपको ‘आदेश पक्का’ या ‘गिरफ़्तारी नहीं होने देंगे’ की गारंटी देता है, वह आपको धोखा दे रहा है। शिकायत करने वाली पत्नी हों या आरोप झेल रहा परिवार, अदालत और पुलिस लगभग इन्हीं बातों को देखती हैं:

  1. आरोप कितने ठोस हैं — किस तारीख़ को, कहाँ, किसने क्या किया, यह लिखा है, या पूरे परिवार के नाम एक साथ डाल दिए गए हैं?
  2. क्या चोट या हिंसा का मेडिकल रिकॉर्ड है, और क्या वह घटना के समय के आसपास का है?आपके हाथ में
  3. क्या लिखित या डिजिटल सबूत हैं — मैसेज, रिकॉर्डिंग, पैसे के लेनदेन, पहले की शिकायतें?आपके हाथ में
  4. जिस व्यक्ति पर आरोप है, वह साथ रहता था या अलग शहर में रहता था, और इसका सबूत क्या है?आपके हाथ में
  5. आरोप कितने गंभीर हैं — गंभीर चोट या जान को ख़तरे वाले मामलों में पुलिस और अदालत अलग तरह से कदम उठाती हैं।
  6. पुलिस नोटिस और अदालत की तारीख़ों पर दोनों पक्षों का बर्ताव कैसा रहा।आपके हाथ में
  7. क्या पहले से कोई दूसरा मुक़दमा चल रहा है, जैसे तलाक या भरण-पोषण का, और शिकायत किस समय दी गई।

जिन बातों के आगे “आपके हाथ में” लिखा है, उन पर आप आज से काम कर सकते हैं — सबूत सुरक्षित रखना, रिकॉर्ड जुटाना और हर नोटिस का समय पर पालन।

एक बात साफ़ समझ लें: घरेलू हिंसा अधिनियम का आवेदन राहत का रास्ता है — संरक्षण, घर, ख़र्च और बच्चों के लिए आदेश। उस पर किसी को सीधे गिरफ़्तार नहीं किया जाता; अदालत का आदेश तोड़ना अलग से अपराध है। गिरफ़्तारी और जमानत का सवाल धारा 85 की एफ़आईआर में उठता है।

कितना समय लगता है

इन मामलों में कई अलग-अलग घड़ियाँ साथ-साथ चलती हैं:

  • घरेलू हिंसा अधिनियम: आवेदन से पहली सुनवाई तककानून कहता है कि मजिस्ट्रेट पहली सुनवाई की तारीख़ आम तौर पर आवेदन मिलने के तीन दिन के भीतर तय करें (धारा 12(4))। ज़रूरत हो तो अदालत अंतरिम आदेश, कभी-कभी दूसरे पक्ष को सुने बिना भी, दे सकती है।
  • पहली सुनवाई से अंतिम आदेश तककानून मजिस्ट्रेट से पहली सुनवाई के साठ दिन के भीतर निपटारे की कोशिश करने को कहता है (धारा 12(5))। व्यवहार में अक्सर इससे ज़्यादा समय लगता है; अपने ज़िले की स्थिति अधिवक्ता से पूछें।
  • मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ़ अपीलआदेश मिलने के तीस दिन के भीतर सत्र न्यायालय में (धारा 29)। अपनी आख़िरी तारीख़ आदेश मिलते ही अधिवक्ता से पक्की कर लें।
  • 498A (धारा 85) की एफ़आईआर के बादउत्तर प्रदेश के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2022 में दिशानिर्देश बनाए थे, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई 2025 में लागू करने का निर्देश दिया: कई मामलों में एफ़आईआर के बाद दो महीने तक नामित लोगों पर गिरफ़्तारी या दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए और मामला ज़िले की परिवार कल्याण समिति को भेजा जाता है। यह हर मामले पर लागू नहीं होता — जैसे जहाँ गंभीर चोट हो। आपके मामले और आपके राज्य पर यह कैसे लागू है, यह अधिवक्ता से जाँचें।
  • आपराधिक मुक़दमे का फ़ैसलाइसका कोई तय समय नहीं है। यह अक्सर सबसे लंबी घड़ी होती है।
वह बात जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते: घरेलू हिंसा अधिनियम का केस और 498A (धारा 85) की एफ़आईआर दो अलग मामले हैं। एक खत्म होने से दूसरा अपने-आप खत्म नहीं होता। और 498A ऐसा अपराध है जिसमें शिकायत वापस लेने या समझौता हो जाने भर से केस बंद नहीं होता — इसके लिए आम तौर पर उच्च न्यायालय जाना पड़ता है।

अधिवक्ता की ज़रूरत कब पड़ती है

  • पुलिस ने नोटिस भेजा है, थाने बुलाया है, या गिरफ़्तारी की बात हो रही है।
  • एफ़आईआर में बूढ़े माता-पिता या ऐसे रिश्तेदारों के नाम हैं जो साथ नहीं रहते।
  • आपको घर से निकाला जा रहा है, या घर में रहने के लिए अदालत का आदेश चाहिए।
  • बच्चे साथ नहीं हैं, या उनकी अभिरक्षा का सवाल है।
  • एक साथ कई मामले हैं — घरेलू हिंसा, भरण-पोषण, तलाक, 498A — और सबकी रणनीति एक साथ तय करनी है।
  • समझौते की बात चल रही है और लिखित समझौता बनना है।
  • परिवार कल्याण समिति या मध्यस्थता केंद्र से बुलावा आया है।

इनमें से कोई स्थिति आप पर लागू होती है, तो अपनी बात व्हाट्सऐप पर लिखिए — आप शिकायत करने वाली हैं या आरोप आप पर है, किस ज़िले का मामला है, और अभी तक क्या कार्रवाई हुई है।

क्या तैयार रखें

  • शादी का प्रमाण — प्रमाण पत्र, कार्ड या फ़ोटो
  • एफ़आईआर, शिकायत या घरेलू हिंसा अधिनियम के आवेदन की प्रति
  • पुलिस का नोटिस या अदालत का समन
  • चोट का मेडिकल रिकॉर्ड और फ़ोटो
  • मैसेज, ईमेल, कॉल रिकॉर्ड और रिकॉर्डिंग — मूल फ़ोन में सुरक्षित
  • स्त्रीधन — गहनों, सामान और उपहारों की सूची, बिल या फ़ोटो
  • दहेज या पैसे देने के बैंक रिकॉर्ड
  • पहले की शिकायतें — 181, थाना, महिला परामर्श केंद्र
  • आरोपित हर व्यक्ति के अलग रहने का प्रमाण, अगर वे साथ नहीं रहते
  • आमदनी के काग़ज़, अगर ख़र्च का सवाल है

आम गलतियाँ

  • “थाने में सेटिंग करा देंगे” या “केस खत्म करा देंगे” कहने वाले बिचौलियों को पैसे देना। कोई भी व्यक्ति पुलिस या अदालत का फ़ैसला पहले से तय नहीं करा सकता।
  • पुलिस नोटिस या अदालत की तारीख़ छोड़ देना, या घर से ग़ायब हो जाना। इससे गिरफ़्तारी और वारंट का ख़तरा बढ़ता है।
  • शिकायत वापस लेने के लिए पत्नी या उसके परिवार पर दबाव डालना या धमकाना। इससे नया मामला बनता है।
  • बिना किसी ठोस घटना के हर रिश्तेदार का नाम शिकायत में जोड़ देना। अदालतें ऐसे अस्पष्ट आरोप रद्द कर देती हैं और असली शिकायत भी कमज़ोर दिखने लगती है।
  • ग़ुस्से में चैट, फ़ोटो या रिकॉर्डिंग डिलीट कर देना, या उनमें काट-छाँट करना।
  • बिना पढ़े किसी समझौते या ‘राज़ीनामे’ पर दस्तख़त करना, और यह मान लेना कि इससे 498A का केस अपने-आप खत्म हो गया।
  • सोशल मीडिया पर दूसरे पक्ष के बारे में लिखना या उनकी निजी फ़ोटो डालना।
घरेलू हिंसा और 498A का सार: पहले चार काम, दो अलग रास्ते, मामला किन बातों पर टिकता है, ज़रूरी दस्तावेज़ और आम गलतियाँ
एक नज़र में — पूरा लेख एक चित्र में

सामान्य प्रश्न

498A अब कौन-सी धारा है?

1 जुलाई 2024 से भारतीय दंड संहिता की जगह भारतीय न्याय संहिता लागू है। पति या उसके रिश्तेदारों की क्रूरता का अपराध अब धारा 85 में है और ‘क्रूरता’ का अर्थ धारा 86 में। इसमें तीन वर्ष तक की सज़ा और जुर्माना हो सकता है। इस तारीख़ से पहले की घटनाओं वाले पुराने केस 498A में ही चलते हैं।

क्या 498A में तुरंत गिरफ़्तारी हो जाती है?

अपने-आप नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के अर्नेश कुमार फ़ैसले (2014) के अनुसार ऐसे अपराधों में पुलिस को गिरफ़्तारी की ज़रूरत का कारण दर्ज करना होता है, और आम तौर पर पहले हाज़िरी का नोटिस दिया जाता है (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35)। फिर भी यह अपराध ग़ैर-जमानती है, इसलिए गिरफ़्तारी की आशंका हो तो अग्रिम जमानत पर अधिवक्ता से बात करें।

घरेलू हिंसा अधिनियम और 498A में क्या अंतर है?

घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 राहत देने वाला कानून है: मजिस्ट्रेट हिंसा रोकने, घर में रहने, ख़र्च, बच्चों की अस्थायी अभिरक्षा और मुआवज़े के आदेश दे सकते हैं। धारा 85 (पुरानी 498A) आपराधिक कानून है, जिसमें सज़ा होती है। दोनों रास्ते साथ भी चल सकते हैं और अलग-अलग भी।

घरेलू हिंसा में क्या-क्या आता है?

सिर्फ़ मारपीट नहीं। कानून शारीरिक, यौन, मौखिक और भावनात्मक हिंसा, और आर्थिक हिंसा — जैसे ख़र्च रोक देना या आपकी चीज़ें छीन लेना — सबको घरेलू हिंसा मानता है (धारा 3)। दहेज के लिए परेशान करना भी इसमें आता है।

क्या मुझे ससुराल के घर में रहने का अधिकार है?

घरेलू हिंसा अधिनियम ‘साझा घर’ में रहने का अधिकार देता है, चाहे घर आपके नाम पर न हो (धारा 17)। सर्वोच्च न्यायालय ने 2020 में कहा कि ससुराल वालों का घर भी साझा घर हो सकता है। आपके मामले में यह लागू होगा या नहीं, यह तथ्यों पर निर्भर है और मजिस्ट्रेट तय करते हैं।

क्या पुरानी घटनाओं पर अब शिकायत हो सकती है?

घरेलू हिंसा अधिनियम के आवेदन पर सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 में कहा कि आपराधिक शिकायत वाली समय-सीमा उस पर लागू नहीं होती। आपराधिक एफ़आईआर के लिए समय-सीमा का सवाल अलग है और मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है — इसे अधिवक्ता से जाँचें। देर जितनी कम हो, उतना अच्छा।

क्या समझौता हो जाने पर 498A का केस खत्म हो जाता है?

अपने-आप नहीं। यह ऐसा अपराध है जिसमें निचली अदालत में राज़ीनामा दर्ज नहीं होता। पति-पत्नी के सच्चे समझौते के आधार पर उच्च न्यायालय कार्यवाही रद्द करने पर विचार कर सकता है, लेकिन यह हर मामले में तय नहीं। देखें एफ़आईआर रद्द कराना।

क्या पति भी घरेलू हिंसा अधिनियम में शिकायत कर सकता है?

नहीं। यह कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए है — शिकायत केवल महिला कर सकती है। आरोप पति के साथ उसके परिवार की महिलाओं पर भी लग सकता है। पति के पास अपनी शिकायतों के लिए दूसरे कानूनी रास्ते हैं, जैसे सामान्य आपराधिक शिकायत या पारिवारिक न्यायालय में मामला।

क्या महिलाओं को मुफ़्त कानूनी सहायता मिलती है?

हाँ। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत महिलाओं को ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण से निःशुल्क कानूनी सेवा का अधिकार है, और संरक्षण अधिकारी भी इसमें मदद करते हैं। आप चाहें तो व्हाट्सऐप पर अपनी स्थिति लिखें; आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।

क्या आप मेरे ज़िले या राज्य में सहायता करते हैं?

हाँ। Online Legal Help भारत के सभी ज़िलों के मामलों में सहायता करता है। अपना ज़िला, थाना और अब तक क्या हुआ, यह व्हाट्सऐप पर लिखिए; आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।

Online Legal Help एक विधिक सूचना और सहायता मंच है। यह लॉ फर्म नहीं है और न ही विधिक सलाह देता है। आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।

कानूनी आधार और स्रोत
  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 — धारा 2 (परिभाषाएँ), धारा 3 (घरेलू हिंसा की परिभाषा), धारा 8 और 9 (संरक्षण अधिकारी), धारा 12 (मजिस्ट्रेट को आवेदन; उपधारा 4: पहली सुनवाई आम तौर पर तीन दिन के भीतर; उपधारा 5: साठ दिन में निपटारे का प्रयास), धारा 17 (साझा घर में रहने का अधिकार), धाराएँ 18 से 22 (संरक्षण, निवास, आर्थिक राहत, अभिरक्षा, मुआवज़ा), धारा 23 (अंतरिम और एकपक्षीय आदेश), धारा 29 (तीस दिन में सत्र न्यायालय में अपील), धारा 31 (संरक्षण आदेश तोड़ने पर दंड)। indiacode.nic.in
  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 — धारा 85 (पति या उसके रिश्तेदार द्वारा क्रूरता; तीन वर्ष तक कारावास और जुर्माना), धारा 86 (क्रूरता की परिभाषा)। पूर्व में भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498A।
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 35 (गिरफ़्तारी और हाज़िरी का नोटिस), धारा 173 (एफ़आईआर), धारा 482 (अग्रिम जमानत), धारा 528 (उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति)।
  • विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 — धारा 12 (निःशुल्क कानूनी सेवा के पात्र, जिनमें महिलाएँ शामिल हैं)।
  • Arnesh Kumar v. State of Bihar, (2014) 8 SCC 273 — सात वर्ष तक की सज़ा वाले अपराधों में अपने-आप गिरफ़्तारी नहीं; पहले हाज़िरी का नोटिस।
  • Shivangi Bansal v. Sahib Bansal (सर्वोच्च न्यायालय, जुलाई 2025; 2025 INSC 883) — इलाहाबाद उच्च न्यायालय के Mukesh Bansal v. State of U.P. (2022) वाले दिशानिर्देश लागू करने का निर्देश: एफ़आईआर के बाद दो महीने की अवधि और परिवार कल्याण समिति।
  • Kamatchi v. Lakshmi Narayanan (सर्वोच्च न्यायालय, 13 अप्रैल 2022) — घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के आवेदन पर आपराधिक शिकायत वाली समय-सीमा लागू नहीं।
  • Satish Chander Ahuja v. Sneha Ahuja (सर्वोच्च न्यायालय, 2020) — ससुराल का घर भी ‘साझा घर’ हो सकता है।
  • Hiral P. Harsora v. Kusum Narottamdas Harsora (सर्वोच्च न्यायालय, 2016) — घरेलू हिंसा अधिनियम में प्रतिवादी केवल वयस्क पुरुष तक सीमित नहीं।
  • Dara Lakshmi Narayana v. State of Telangana (सर्वोच्च न्यायालय, दिसंबर 2024) — रिश्तेदारों पर अस्पष्ट, सामान्य आरोपों वाली कार्यवाही रद्द।
  • आपात सहायता: 112 (आपात प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली); महिला हेल्पलाइन 181 (राज्य सरकारों द्वारा संचालित)।