जमानत कैसे मिलती है — गिरफ़्तारी हो गई है या होने का डर है, पहले क्या करें?
संपादक: डॉ. अखिल सिंह · अंतिम अद्यतन: 2 अक्टूबर 2026
जमानत दो तरह से माँगी जाती है। अगर गिरफ़्तारी अभी नहीं हुई, लेकिन गैर-ज़मानती अपराध में गिरफ़्तारी का डर है, तो सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत की अर्ज़ी दी जाती है (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 482)। अगर गिरफ़्तारी हो चुकी है, तो नियमित जमानत की अर्ज़ी आम तौर पर पहले मजिस्ट्रेट के पास (धारा 480), और वहाँ राहत न मिले तो सत्र या उच्च न्यायालय में (धारा 483) दी जाती है। ज़मानती अपराध में जमानत व्यक्ति का अधिकार है (धारा 478)।
अभी क्या करें
- पता करें कि व्यक्ति किस थाने में है और उस पर कौन-सी धाराएँ लगी हैं। यह लिखकर रखें — आगे हर अर्ज़ी इसी से तय होती है।
- एफ़आईआर की प्रति लें। कई राज्यों में यह पुलिस की वेबसाइट पर भी मिल जाती है। एफ़आईआर से जुड़ी पूरी जानकारी एफ़आईआर और पुलिस शिकायत वाले पृष्ठ पर है।
- गिरफ़्तारी हुई है, तो गिरफ़्तारी ज्ञापन (अरेस्ट मेमो) की प्रति माँगें, और देखें कि परिवार को गिरफ़्तारी की सूचना दी गई है या नहीं।
- गिरफ़्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर (यात्रा का समय छोड़कर) मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ज़रूरी है (संविधान का अनुच्छेद 22(2))। उस पहली पेशी — रिमांड की सुनवाई — से पहले अधिवक्ता से बात कर लें।
- पुलिस का नोटिस आया है, तो उसे अनदेखा न करें। सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस को आम तौर पर पहले हाज़िर होने का नोटिस देना होता है, और नोटिस का पालन करने वाले व्यक्ति को आम तौर पर गिरफ़्तार नहीं किया जाना चाहिए (धारा 35(3); सर्वोच्च न्यायालय, जनवरी 2026)।
- ज़मानतदार — यानी जमानत लेने वाला परिचित या रिश्तेदार — और उसके पहचान व संपत्ति या आय के कागज़ अभी से तैयार रखें। आदेश होने के बाद देर अक्सर इसी से होती है।
- थाने में कोई भी कागज़ बिना पढ़े साइन न करें, और ‘सेटिंग’ की बात करने वाले किसी व्यक्ति को पैसे न दें।
आपकी स्थिति कौन-सी है
| आपकी स्थिति | आपको क्या चाहिए |
|---|---|
| एफ़आईआर दर्ज हुई है, गिरफ़्तारी अभी नहीं हुई, पर डर है। | सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत की अर्ज़ी। |
| पुलिस ने हाज़िर होने का नोटिस भेजा है। | अधिवक्ता से सलाह लेकर नोटिस का पालन; ज़रूरत हो तो साथ में अग्रिम जमानत की अर्ज़ी। |
| गिरफ़्तारी हो चुकी है, मजिस्ट्रेट के सामने पेशी होने वाली है। | पेशी पर ही नियमित जमानत की अर्ज़ी, और पुलिस हिरासत (रिमांड) की माँग का जवाब। |
| मजिस्ट्रेट ने जमानत खारिज कर दी है। | सत्र न्यायालय में, और वहाँ से भी राहत न मिले तो उच्च न्यायालय में जमानत की अर्ज़ी। |
| जमानत मिल गई, पर शर्तें पूरी नहीं हो पा रहीं या ज़मानतदार नहीं मिल रहा। | शर्तें बदलवाने की अर्ज़ी। |
| व्यक्ति जेल में है और पुलिस ने अब तक आरोप-पत्र दाखिल नहीं किया। | डिफ़ॉल्ट जमानत की अर्ज़ी (धारा 187(3)) — समय-सीमा अपराध के हिसाब से अलग है, इसकी गिनती अधिवक्ता से कराएँ। |
| केस ही झूठा या बदले की भावना से किया गया लगता है। | जमानत के साथ एफ़आईआर रद्द कराने की याचिका पर भी विचार। |
क्या जमानत मिल जाएगी?
सीधी बात: यह कोई पहले से नहीं बता सकता। जो व्यक्ति आपको जमानत की ‘गारंटी’ देता है या ‘सेटिंग’ की बात करता है, वह आपको धोखा दे रहा है। जमानत का फ़ैसला केवल अदालत करती है, और वह आम तौर पर ये बातें देखती है:
- अपराध कौन-सा है, उसमें कितनी सज़ा हो सकती है, और वह ज़मानती है या गैर-ज़मानती।
- आरोपों के समर्थन में शुरुआती सामग्री कितनी मज़बूत है।
- पुलिस को पूछताछ के लिए हिरासत की सचमुच ज़रूरत है या नहीं।
- व्यक्ति के भाग जाने, सबूत मिटाने या गवाहों को डराने की आशंका कितनी है — स्थायी पता, नौकरी और परिवार के कागज़ इस डर को कम करते हैं।आपके हाथ में
- पहले से कोई आपराधिक मामला है या नहीं।
- नोटिस मिलने पर व्यक्ति पुलिस के सामने पेश हुआ या नहीं, और जाँच में सहयोग किया या नहीं।आपके हाथ में
- कुछ विशेष कानूनों में शर्तें आम मामलों से कड़ी हैं — जैसे मादक पदार्थों (NDPS) के बड़े मामलों में, या अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के मामलों में अग्रिम जमानत पर विशेष रोक।
जिन बातों के आगे “आपके हाथ में” लिखा है, उन पर आप आज से काम कर सकते हैं — पते, नौकरी और परिवार के कागज़ जुटाना, और नोटिस मिलने पर समय पर पेश होना।
उत्तर प्रदेश के लिए एक ज़रूरी बात: पहले उत्तर प्रदेश में मृत्युदंड या आजीवन कारावास वाले अपराधों और कुछ विशेष कानूनों के मामलों में अग्रिम जमानत पर राज्य का अलग प्रतिबंध था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2025 के फ़ैसलों में कहा है कि नई संहिता (धारा 482) आने के बाद वह प्रतिबंध लागू नहीं रहा। आपके मामले में इसका क्या असर है, यह अधिवक्ता से पूछें।
कितना समय लगता है
जमानत में कई अलग-अलग घड़ियाँ चलती हैं:
- गिरफ़्तारी से मजिस्ट्रेट के सामने पेशी तक24 घंटे के भीतर, यात्रा का समय छोड़कर (संविधान का अनुच्छेद 22(2))। यही सबसे ज़रूरी घड़ी है — इसी पेशी पर हिरासत और जमानत का पहला फ़ैसला होता है।
- अर्ज़ी दायर होने से सुनवाई तकइसका कोई तय समय नहीं है। मजिस्ट्रेट के यहाँ अर्ज़ी पहली पेशी पर भी दी जा सकती है; सत्र और उच्च न्यायालय में सुनवाई उनकी सूची पर निर्भर करती है।
- जमानत आदेश से जेल से रिहाई तकआदेश के बाद ज़मानतदार और बॉन्ड के कागज़ों की जाँच होती है, फिर रिहाई का आदेश जेल पहुँचता है। कागज़ अधूरे हों तो यह घड़ी लंबी खिंचती है।
- आरोप-पत्र न आने पर (डिफ़ॉल्ट जमानत)अगर पुलिस कानून में तय अवधि के भीतर आरोप-पत्र दाखिल नहीं करती, तो हिरासत में बंद व्यक्ति को जमानत का अधिकार मिल सकता है (धारा 187(3))। यह अवधि अपराध के हिसाब से अलग है; इसकी गिनती अधिवक्ता से कराएँ, क्योंकि अर्ज़ी समय पर देनी होती है।
अधिवक्ता की ज़रूरत कब पड़ती है
- गिरफ़्तारी हो चुकी है और मजिस्ट्रेट के सामने पेशी होने वाली है।
- पुलिस ने नोटिस भेजा है, या गिरफ़्तारी की बात कर रही है।
- मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय ने जमानत खारिज कर दी है।
- मामला मादक पदार्थ, अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण, या किसी और विशेष कानून का है।
- जमानत मिली है, पर शर्तें पूरी नहीं हो पा रहीं या ज़मानतदार नहीं मिल रहा।
- व्यक्ति लंबे समय से जेल में है और आरोप-पत्र नहीं आया।
- एफ़आईआर 1 जुलाई 2024 से पहले की है: पुरानी और नई संहिता में से किसके तहत अर्ज़ी दी जाए, इस पर अलग-अलग उच्च न्यायालयों के फ़ैसले अलग रहे हैं।
इनमें से कोई स्थिति आप पर लागू होती है, तो अपनी बात व्हाट्सऐप पर लिखिए — किस थाने का मामला है, कौन-सी धाराएँ लगी हैं, और गिरफ़्तारी हुई है या नहीं।
क्या तैयार रखें
- एफ़आईआर की प्रति और धाराओं की सूची
- गिरफ़्तारी ज्ञापन (अरेस्ट मेमो), यदि गिरफ़्तारी हुई है
- पुलिस का नोटिस, यदि आया है
- थाने और अदालत का नाम, और अगली तारीख़
- आरोपी का पहचान पत्र और स्थायी पते का प्रमाण
- नौकरी, व्यवसाय या पढ़ाई का प्रमाण
- ज़मानतदार का पहचान पत्र और संपत्ति या आय के कागज़
- पहले के मामलों की जानकारी और उनके आदेश, यदि कोई हों
- पहले खारिज हुई जमानत अर्ज़ी का आदेश, यदि हो
आम गलतियाँ
- “जमानत पक्की करा देंगे” या “सेटिंग है” कहने वाले बिचौलियों को पैसे देना। जमानत का फ़ैसला केवल अदालत करती है।
- रिमांड की पहली सुनवाई बिना अधिवक्ता के निकल जाने देना।
- थाने में बिना पढ़े कागज़ों पर दस्तखत करना।
- पुलिस के नोटिस को अनदेखा करना — इससे गिरफ़्तारी का आधार बन सकता है।
- ज़मानतदार के कागज़ आख़िरी समय तक न जुटाना, जिससे आदेश के बाद भी रिहाई में देर हो।
- जमानत मिलने के बाद तारीख़ पर हाज़िर न होना या शर्तें तोड़ना — इससे जमानत रद्द हो सकती है।
- अग्रिम जमानत की अर्ज़ी लगाकर मान लेना कि अब गिरफ़्तारी नहीं हो सकती। जब तक अदालत अंतरिम सुरक्षा का आदेश न दे, खतरा बना रहता है।

सामान्य प्रश्न
ज़मानती और गैर-ज़मानती अपराध में क्या फ़र्क़ है?
ज़मानती अपराध में जमानत व्यक्ति का अधिकार है — पुलिस या अदालत को बॉन्ड या ज़मानतदार लेकर उसे छोड़ना होता है (धारा 478)। गैर-ज़मानती अपराध में जमानत देना अदालत के विवेक पर है; वह अपराध की गंभीरता, सबूत और भागने के खतरे जैसी बातें देखती है (धारा 480)। अपराध ज़मानती है या नहीं, यह एफ़आईआर की धाराओं से तय होता है।
अग्रिम जमानत कहाँ मिलती है?
सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में (धारा 482)। मजिस्ट्रेट अग्रिम जमानत नहीं देता। पहले किस अदालत में जाएँ, यह मामले पर निर्भर करता है — इसे अधिवक्ता से तय कराएँ।
क्या अग्रिम जमानत कुछ ही समय के लिए मिलती है?
सर्वोच्च न्यायालय ने 2020 में कहा कि अग्रिम जमानत आम तौर पर किसी तय समय तक सीमित नहीं होती और मुक़दमे के अंत तक चल सकती है। अदालत किसी विशेष कारण से समय-सीमा या शर्तें लगा सकती है।
क्या हर अपराध में अग्रिम जमानत मिल सकती है?
नहीं। नाबालिग लड़की से बलात्कार के कुछ अपराधों में कानून ही अग्रिम जमानत पर रोक लगाता है (धारा 482(4))। अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे कुछ विशेष कानूनों में भी अलग रोक है। बाकी मामलों में फ़ैसला अदालत के विवेक पर है।
पुलिस रिमांड क्या होता है?
गिरफ़्तारी के बाद पुलिस पूछताछ के लिए मजिस्ट्रेट से हिरासत माँग सकती है। मजिस्ट्रेट तय करता है कि व्यक्ति पुलिस हिरासत में रहेगा, न्यायिक हिरासत (जेल) में, या जमानत पर छूटेगा (धारा 187)। इसी सुनवाई पर अधिवक्ता की मौजूदगी सबसे ज़्यादा काम आती है।
ज़मानतदार कौन बन सकता है?
आम तौर पर कोई परिचित या रिश्तेदार, जिसके पास पहचान पत्र और अदालत को संतुष्ट करने लायक संपत्ति या आय के कागज़ हों। अदालत के आदेश में लिखा होता है कि कितने ज़मानतदार और किस राशि का बॉन्ड चाहिए।
डिफ़ॉल्ट जमानत क्या है?
अगर पुलिस कानून में तय अवधि के भीतर आरोप-पत्र दाखिल नहीं करती, तो हिरासत में बंद व्यक्ति को जमानत का अधिकार मिल सकता है, बशर्ते वह जमानत देने को तैयार हो (धारा 187(3))। यह अवधि अपराध के हिसाब से अलग है, और अर्ज़ी समय पर देनी होती है।
जमानत मिलने के बाद क्या ध्यान रखें?
हर तारीख़ पर हाज़िर रहें, अदालत की सभी शर्तों का पालन करें, और गवाहों या शिकायतकर्ता से संपर्क न करें। शर्तें तोड़ने पर जमानत रद्द हो सकती है।
एफ़आईआर 1 जुलाई 2024 से पहले की है, तो कौन-सा कानून लागू होगा?
1 जुलाई 2024 से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू है। उससे पहले दर्ज मामलों में अर्ज़ी पुरानी संहिता के तहत दी जाए या नई के तहत, इस पर अलग-अलग उच्च न्यायालयों के फ़ैसले अलग रहे हैं। अपने मामले में यह अधिवक्ता से पक्का कर लें।
क्या आप मेरे ज़िले या राज्य में सहायता करते हैं?
हाँ। Online Legal Help भारत के सभी ज़िलों के मामलों में सहायता करता है। अपना ज़िला, थाना और गिरफ़्तारी हुई है या नहीं, यह व्हाट्सऐप पर लिखिए; आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।
Online Legal Help एक विधिक सूचना और सहायता मंच है। यह लॉ फर्म नहीं है और न ही विधिक सलाह देता है। आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।
कानूनी आधार और स्रोत
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 478 (ज़मानती अपराध में जमानत), 480 (गैर-ज़मानती अपराध में जमानत), 482 (गिरफ़्तारी की आशंका पर जमानत का निर्देश — अग्रिम जमानत; 482(4) में रोक), 483 (जमानत के संबंध में उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय की विशेष शक्तियाँ)। indiacode.nic.in
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — धारा 35(3) (हाज़िर होने का नोटिस), धारा 187 (हिरासत; 187(3) डिफ़ॉल्ट जमानत), धारा 531 (पुरानी संहिता से संक्रमण)।
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 — धारा 65 और 70(2), जिन पर धारा 482(4) की रोक लागू होती है।
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 22(2): गिरफ़्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेशी।
- Satender Kumar Antil v. Central Bureau of Investigation (सर्वोच्च न्यायालय, 15 जनवरी 2026) — सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में धारा 35(3) का नोटिस नियम, गिरफ़्तारी अपवाद।
- Sushila Aggarwal v. State (NCT of Delhi) (सर्वोच्च न्यायालय, संविधान पीठ, 2020) — अग्रिम जमानत आम तौर पर समय से सीमित नहीं।
- Abdul Hameed v. State of U.P., 2025 SCC OnLine All 4046; Sudhir @ Sudhir Kumar Chaurasia v. State of U.P., 2025:AHC-LKO:34988 (14 जून 2025) — उत्तर प्रदेश में अग्रिम जमानत पर राज्य का पुराना प्रतिबंध धारा 482 के बाद लागू नहीं।