सीधा उत्तर

चेक बाउंस होने पर, बैंक से चेक लौटने की जानकारी मिलने के 30 दिनों के भीतर चेक देने वाले को लिखित नोटिस भेजना ज़रूरी है। नोटिस मिलने के 15 दिनों में वह भुगतान न करे, तो उसके बाद एक महीने के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दायर की जा सकती है (नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 और 142)। अगर नोटिस आपको मिला है, तो वही 15 दिन आपके लिए भी सबसे अहम हैं।

अभी क्या करें

  1. बैंक की रिटर्न मेमो (चेक लौटने के कारण वाली पर्ची) और मूल चेक संभालकर रखें। नोटिस की 30 दिन की गिनती चेक लौटने की जानकारी मिलने से शुरू होती है।
  2. 30 दिनों के भीतर लिखित नोटिस भेजें, और उसमें चेक की रक़म ठीक वही लिखें जो चेक पर है। सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2025 में कहा कि अलग रक़म लिखने पर नोटिस अमान्य हो जाता है। ब्याज या खर्च अलग से माँगा जा सकता है।
  3. नोटिस सही और पूरे पते पर ऐसे भेजें कि उसका सबूत रहे — डाक की रसीद, ट्रैकिंग और पावती संभालें।
  4. नोटिस मिलने की तारीख़ से 15 दिन पूरे होने का इंतज़ार करें। उसके बाद एक महीने के भीतर शिकायत दायर करने की तैयारी रखें — यह सीमा न चूकें।
  5. उधार या सौदे के सबूत एक जगह रखें — समझौता, बिल, बैंक ट्रांसफ़र की एंट्री, और वे मैसेज जिनमें सामने वाले ने पैसा लौटाने की बात मानी हो।
  6. अगर चेक आपने दिया था और नोटिस मिला है, तो उसे अनदेखा न करें। तारीख़ लिख लें, और 15 दिनों के भीतर भुगतान करना है या लिखित जवाब देना है, यह अधिवक्ता से बात करके तय करें।
  7. बातचीत चलती रहे, पर समय-सीमाएँ रुकी हुई न मानें — ‘अगले हफ़्ते दे दूँगा’ के भरोसे तारीख़ निकल जाना सबसे आम नुकसान है।

आपकी स्थिति कौन-सी है

आपकी स्थितिआपको क्या चाहिए
मैंने पैसे दिए थे, बदले में मिला चेक बाउंस हो गया।30 दिनों में लिखित नोटिस, फिर ज़रूरत हो तो शिकायत। दीवानी वसूली का रास्ता भी है — देखें उधार और बकाया पैसे की वसूली।
नोटिस भेज दिया, 15 दिन बीत गए, पैसा नहीं आया।अगले एक महीने में शिकायत — उस अदालत में, जिसके क्षेत्र में आपकी वह बैंक शाखा है जहाँ आपने चेक जमा किया था।
नोटिस की 30 दिन की सीमा या शिकायत का एक महीना निकल चुका है।जल्दी अधिवक्ता से जाँच कराएँ कि अब कौन-सा रास्ता बचा है — शिकायत में देरी माफ़ करने का आवेदन, या पैसे की वसूली का दीवानी मुक़दमा।
मुझे चेक बाउंस का नोटिस मिला है।15 दिनों के भीतर भुगतान, या आपत्ति हो तो लिखित जवाब। देखें कानूनी नोटिस और उसका जवाब।
मेरे खिलाफ़ केस हो गया है, अदालत से समन आया है।तारीख़ पर अदालत में हाज़िर होना और जमानत लेना — यह अपराध जमानती है। समझौता किसी भी चरण में हो सकता है।
मेरा ‘सिक्योरिटी’ के लिए दिया चेक बाउंस करा दिया गया।सिर्फ़ ‘सिक्योरिटी चेक’ कहना बचाव नहीं है। अदालत देखती है कि चेक जमा करते समय कोई कर्ज़ या देनदारी सच में बकाया थी या नहीं।
सज़ा हो गई है, ऊपरी अदालत में अपील करनी है।अपील हो सकती है। अपील सुनने वाली अदालत जुर्माने या मुआवज़े का कम से कम 20 प्रतिशत जमा करवा सकती है। देखें अपील और रद्द करने की याचिका।

क्या मेरा पैसा वापस मिलेगा?

सीधी बात: यह कोई पहले से नहीं बता सकता कि पैसा मिलेगा या कब मिलेगा। जो व्यक्ति ‘दो तारीख़ में पैसा निकलवा देंगे’ या ‘केस पक्का जीतेंगे’ की गारंटी देता है, वह आपको धोखा दे रहा है। नतीजा आम तौर पर इन बातों पर निर्भर करता है:

  1. नोटिस 30 दिनों के भीतर, सही पते पर और चेक की सही रक़म के साथ भेजा गया या नहीं।आपके हाथ में
  2. शिकायत 15 दिन पूरे होने के बाद, एक महीने के भीतर और सही अदालत में दायर हुई या नहीं।आपके हाथ में
  3. चेक किसी असली कर्ज़ या देनदारी के लिए था, और उसके काग़ज़ी सबूत कितने हैं।आपके हाथ में
  4. सामने वाला क्या बचाव लेता है। कानून यह मानकर चलता है कि चेक किसी कर्ज़ या देनदारी के लिए दिया गया था, पर सामने वाला सबूत देकर इसे गलत साबित करने की कोशिश कर सकता है।
  5. चेक किसी व्यक्ति का है या फ़र्म या कंपनी का, और केस सही लोगों के खिलाफ़ किया गया या नहीं।
  6. सामने वाले के पास भुगतान की क्षमता है या नहीं, और वह समझौते के लिए तैयार है या नहीं।

जिन बातों के आगे “आपके हाथ में” लिखा है, वे समय-सीमा और काग़ज़ों से जुड़ी हैं — और ज़्यादातर केस इन्हीं में कमज़ोर पड़ते हैं। इन पर आज से काम शुरू हो सकता है।

अगर चेक आपने दिया था: सज़ा होगी या नहीं, यह भी कोई पहले से तय नहीं कर सकता। कानून में दो साल तक की जेल या चेक की रक़म के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों, अधिकतम सीमा है — हर केस का नतीजा नहीं। यह अपराध समझौते योग्य है।

कितना समय लगता है

चेक बाउंस में एक नहीं, कई अलग-अलग घड़ियाँ चलती हैं, और हर एक की अपनी तारीख़ है:

  • चेक की वैधताचेक जारी होने की तारीख़ से तीन महीने तक बैंक में जमा किया जा सकता है (रिज़र्व बैंक का निर्देश, 1 अप्रैल 2012 से)। केस उसी चेक पर बनता है जो इस अवधि में जमा हुआ हो।
  • नोटिसबैंक से चेक लौटने की जानकारी मिलने के 30 दिनों के भीतर लिखित नोटिस।
  • भुगतान का मौक़ानोटिस मिलने के बाद चेक देने वाले के पास भुगतान के लिए 15 दिन होते हैं।
  • शिकायत15 दिन बीतने के बाद एक महीने के भीतर। देर होने पर अदालत पर्याप्त कारण देखकर देरी माफ़ कर सकती है, पर यह उसके विवेक पर है।
  • मुक़दमाकानून कहता है कि अदालत शिकायत दायर होने से छह महीने में मुक़दमा निपटाने की कोशिश करे (धारा 143)। व्यवहार में अक्सर ज़्यादा समय लगता है; अपने ज़िले का अंदाज़ा अधिवक्ता से लें।
  • अंतरिम मुआवज़ाअदालत चाहे तो मुक़दमे के दौरान चेक की रक़म के 20 प्रतिशत तक अंतरिम मुआवज़ा दिलवा सकती है, जो आदेश के 60 दिनों के भीतर देना होता है (धारा 143A)। यह अपने-आप नहीं मिलता।
वह बात जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते: नोटिस की 30 दिन की गिनती बैंक से चेक लौटने की जानकारी मिलते ही चलने लगती है — सामने वाले के ‘बस दो दिन और’ कहने से नहीं रुकती। वादों के भरोसे इंतज़ार में यह सीमा निकल जाए, तो धारा 138 का रास्ता कमज़ोर पड़ सकता है। चेक लौटते ही तारीख़ लिख लें।

अधिवक्ता की ज़रूरत कब पड़ती है

  • नोटिस का मसौदा बनाना है — रक़म, तारीख़ें और पता बिल्कुल सही चाहिए।
  • चेक किसी फ़र्म या कंपनी का है, और तय करना है कि केस किन-किन लोगों के खिलाफ़ हो।
  • 30 दिन या एक महीने की सीमा निकलने वाली है, या निकल चुकी है।
  • सामने वाला कह रहा है कि चेक ‘सिक्योरिटी’ था, या कोई कर्ज़ था ही नहीं।
  • आपको नोटिस या अदालत का समन मिला है, और जवाब या हाज़िरी तय करनी है।
  • अदालत ने अंतरिम मुआवज़ा जमा करने का आदेश दिया है, या सज़ा हुई है और अपील करनी है।
  • सामने वाला दूसरे शहर या राज्य में है, या एक से ज़्यादा चेक बाउंस हुए हैं।

इनमें से कोई स्थिति आप पर लागू होती है, तो अपनी बात व्हाट्सऐप पर लिखिए — किस ज़िले का मामला है, चेक आपको मिला था या आपने दिया था, बैंक से चेक कब लौटा, और नोटिस भेजा या मिला है तो किस तारीख़ को।

क्या तैयार रखें

  • मूल चेक, जो बाउंस हुआ
  • बैंक की रिटर्न मेमो — चेक लौटने का कारण और तारीख़
  • भेजे गए नोटिस की प्रति, डाक की रसीद, ट्रैकिंग और पावती
  • कर्ज़ या सौदे के सबूत — लिखित समझौता, बिल, इनवॉइस या रसीद
  • बैंक स्टेटमेंट, जिसमें आपके दिए पैसे की एंट्री दिखे
  • सामने वाले से हुई बातचीत के मैसेज या ईमेल, जिनमें उसने पैसा लौटाने की बात मानी हो
  • सामने वाले का पूरा नाम, पता, मोबाइल नंबर और ईमेल
  • चेक किसी फ़र्म या कंपनी का हो, तो उसका नाम और उसे चलाने वालों की जानकारी
  • अपना पहचान और पते का प्रमाण
  • अगर केस आपके खिलाफ़ है: नोटिस, समन और किए गए भुगतान का सबूत

आम गलतियाँ

  • ‘दो तारीख़ में पैसा निकलवा देंगे’ या ‘केस अंदर से खत्म करवा देंगे’ कहने वाले बिचौलियों को पैसे देना। अदालत का नतीजा कोई पहले से तय नहीं करा सकता।
  • सामने वाले के वादों के भरोसे नोटिस की 30 दिन की सीमा निकल जाने देना।
  • नोटिस में चेक से अलग रक़म लिखना, या अधूरा या गलत पता लिखना।
  • 15 दिन पूरे होने से पहले ही शिकायत दायर कर देना, या उसके बाद एक महीने की सीमा चूक जाना।
  • मूल चेक या बैंक की रिटर्न मेमो खो देना।
  • अगर चेक आपने दिया था: नोटिस या समन को अनदेखा करना। तारीख़ पर हाज़िर न होने से मामला और बिगड़ सकता है।
  • बिना लिखा-पढ़ी के समझौता करना या भुगतान करना — हर भुगतान की रसीद लें और समझौता अदालत में दर्ज कराएँ।
चेक बाउंस का सार: पहले चार काम, आप चेक पाने वाले हैं या देने वाले, नतीजा किन बातों पर निर्भर है, ज़रूरी दस्तावेज़ और आम गलतियाँ
एक नज़र में — पूरा लेख एक चित्र में

सामान्य प्रश्न

चेक बाउंस होने पर कितनी सज़ा हो सकती है?

धारा 138 में दो साल तक की जेल, या चेक की रक़म के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है। यह अधिकतम सीमा है; किस केस में क्या होगा, यह अदालत तय करती है। बहुत से मामले भुगतान और समझौते से भी खत्म होते हैं।

क्या चेक बाउंस के केस में पुलिस गिरफ़्तार कर सकती है?

धारा 138 का अपराध असंज्ञेय और जमानती है। इसमें आम तौर पर एफ़आईआर नहीं होती; चेक पाने वाला सीधे मजिस्ट्रेट के सामने लिखित शिकायत करता है और अदालत समन भेजती है। समन मिलने पर तारीख़ पर हाज़िर होना ज़रूरी है — बार-बार हाज़िर न होने पर अदालत वारंट जारी कर सकती है।

चेक बाउंस का केस किस शहर की अदालत में होता है?

अगर चेक पाने वाले ने चेक अपने बैंक खाते के ज़रिए वसूली के लिए जमा किया था, तो केस उस अदालत में होता है जिसके क्षेत्र में उसकी वह बैंक शाखा है (धारा 142(2))। यानी आम तौर पर चेक पाने वाला अपने ही शहर में शिकायत कर सकता है।

‘सिक्योरिटी’ के लिए दिया गया चेक बाउंस हो तो भी केस बनता है?

बन सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिसंबर 2021 में कहा कि किसी चेक को ‘सिक्योरिटी’ कह देने भर से वह धारा 138 से बाहर नहीं हो जाता। असली सवाल यह है कि चेक जमा करते समय कोई कर्ज़ या देनदारी बकाया थी या नहीं। यह हर केस के काग़ज़ों पर निर्भर करता है।

अगर चेक ‘पेमेंट रोक दिया गया’, ‘खाता बंद’ या ‘हस्ताक्षर नहीं मिलते’ लिखकर लौटा हो?

सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसलों के अनुसार ऐसे कारणों से लौटे चेक पर भी धारा 138 का केस बन सकता है, सिर्फ़ ‘पैसे कम हैं’ पर नहीं। चेक देने वाला फिर भी अपना बचाव रख सकता है। मेमो पर लिखा कारण अधिवक्ता को दिखाएँ।

क्या केस के बीच में समझौता हो सकता है?

हाँ। यह अपराध समझौते योग्य है (धारा 147), और समझौता मुक़दमे के किसी भी चरण में हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2025 में अदालतों से जल्दी समझौते को बढ़ावा देने को कहा। देर से समझौते पर अदालत अतिरिक्त खर्च जमा करवा सकती है।

अंतरिम मुआवज़ा क्या होता है?

मुक़दमा चलते समय अदालत चेक की रक़म के 20 प्रतिशत तक अंतरिम मुआवज़ा दिलवा सकती है, जो आदेश के 60 दिनों में देना होता है (धारा 143A)। सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में साफ़ किया कि यह अदालत के विवेक पर है। आरोपी बरी हो, तो यह रक़म ब्याज सहित लौटानी पड़ती है।

मैंने बड़ी रक़म नकद उधार दी थी। क्या फिर भी केस बनता है?

सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2025 में कहा कि आयकर नियम के खिलाफ़ दिया गया 20,000 रुपये से ज़्यादा का नकद उधार भी चेक बाउंस के केस के लिए वसूली-योग्य कर्ज़ माना जा सकता है। आयकर नियम तोड़ने का जुर्माना अलग से लग सकता है।

अदालत का समन व्हाट्सऐप या ईमेल पर आया है — क्या यह मान्य है?

सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2025 में निर्देश दिया कि चेक बाउंस के मामलों में समन सामान्य तरीक़ों के अलावा ईमेल और व्हाट्सऐप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी भेजे जा सकते हैं। इसलिए ऐसे संदेश को अनदेखा न करें। उसमें लिखी अदालत, केस नंबर और तारीख़ की पुष्टि अधिवक्ता से कराएँ।

क्या आप मेरे ज़िले या राज्य में सहायता करते हैं?

हाँ। Online Legal Help भारत के सभी ज़िलों के मामलों में सहायता करता है। अपना ज़िला, चेक आपको मिला था या आपने दिया था, और मामला किस चरण में है, व्हाट्सऐप पर लिखिए; आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।

Online Legal Help एक विधिक सूचना और सहायता मंच है। यह लॉ फर्म नहीं है और न ही विधिक सलाह देता है। आवश्यकता होने पर आपको स्वतंत्र अधिवक्ता से संपर्क कराया जा सकता है।

कानूनी आधार और स्रोत
  • नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (परक्राम्य लिखत अधिनियम), 1881 — धारा 138: चेक बाउंस का अपराध; दो वर्ष तक कारावास या चेक की रक़म के दोगुने तक जुर्माना या दोनों; परंतुक (क) छह माह या वैधता अवधि, जो पहले हो, के भीतर प्रस्तुति, (ख) बैंक से सूचना मिलने के 30 दिनों में लिखित माँग, (ग) नोटिस मिलने के 15 दिनों में भुगतान न होना। indiacode.nic.in
  • धारा 139: धारक के पक्ष में यह उपधारणा कि चेक किसी कर्ज़ या देनदारी के लिए दिया गया था।
  • धारा 142: केवल लिखित शिकायत पर संज्ञान; वाद-हेतु उत्पन्न होने के एक माह के भीतर शिकायत, पर्याप्त कारण पर देरी माफ़; मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट; धारा 142(2) — क्षेत्राधिकार उस बैंक शाखा के स्थान पर जहाँ पाने वाले का खाता है (2015 का संशोधन)।
  • धारा 143: संक्षिप्त विचारण; शिकायत दायर होने से छह माह में निपटाने का प्रयास (धारा 143(3))।
  • धारा 143A (2018 में जोड़ी गई): चेक की रक़म के 20 प्रतिशत तक अंतरिम मुआवज़ा, आदेश के 60 दिनों में देय (30 दिन और बढ़ सकते हैं); बरी होने पर ब्याज सहित वापसी।
  • धारा 147: इस अधिनियम के अपराध समझौते योग्य। धारा 148 (2018): दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील में जुर्माने या मुआवज़े का कम से कम 20 प्रतिशत जमा कराने का आदेश।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक का निर्देश — 1 अप्रैल 2012 से चेक, ड्राफ़्ट और पे-ऑर्डर की वैधता छह से घटाकर तीन माह।
  • Sanjabij Tari v. Kishore S. Borcar, 2025 INSC 1158 (सर्वोच्च न्यायालय, 25 सितंबर 2025) — ईमेल और व्हाट्सऐप सहित इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से समन; ज़िला अदालतों में ऑनलाइन भुगतान की व्यवस्था; जल्दी समझौते को बढ़ावा; 20,000 रुपये से अधिक का नकद उधार भी धारा 138 के लिए कर्ज़ माना जा सकता है।
  • Kaveri Plastics v. Mahdoom Bawa Bahrudeen Noorul, 2025 INSC 1133 (सर्वोच्च न्यायालय, सितंबर 2025) — नोटिस में चेक से अलग रक़म लिखी हो तो नोटिस अमान्य; ब्याज और खर्च अलग से माँगे जा सकते हैं।
  • Rakesh Ranjan Shrivastava v. State of Jharkhand, 2024 INSC 205 (सर्वोच्च न्यायालय, 15 मार्च 2024) — धारा 143A का अंतरिम मुआवज़ा अनिवार्य नहीं, विवेकाधीन।
  • Sunil Todi v. State of Gujarat (सर्वोच्च न्यायालय, 3 दिसंबर 2021) — ‘सिक्योरिटी’ कहलाने वाला चेक भी धारा 138 के दायरे में आ सकता है।
  • ‘पेमेंट रोका गया’, ‘खाता बंद’ और ‘हस्ताक्षर नहीं मिलते’ पर धारा 138 लागू — सर्वोच्च न्यायालय: MMTC Ltd. v. Medchl Chemicals; NEPC Micon Ltd. v. Magma Leasing; Laxmi Dyechem v. State of Gujarat।
  • प्रक्रिया: शिकायत और विचारण पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 लागू होती है, जहाँ नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट में अलग से प्रावधान न हो।